हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २१ ] जिन अनिवार्य कारणों के उपस्थित होने से महाराज शिवाजी को अपने मरहठे भाइयों के विरुद्ध तलवार उठानी पड़ी, जिनके कारण महाराज रणजीतसिंह ने कई एक सिक्ख मिसलों को दण्ड देकर अपनी अधीनता स्वीकार कराई, उन्हीं कारणों के उपस्थित होने पर महाराष्ट्र मण्डल को भी हठी हिंदू राज्यों को अपने अधीन करने में शस्त्र उठाना पड़ा। और जैसे महाराज शिवाजी तथा रणजीतसिंह अपने उन कार्यों के लिये दोषी नहीं ठहराये जाते वैसे ही महाराष्ट्र-मण्डल भी इसके लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता। मरहठों के विरोधियों में भी केवल एक ही दो ऐसे हैं जो कि मरहठों से विरोध करने के लिये दोषी ठहराये जा सकते हैं, उनमें से बहुतेरे ऐसे थे जो हिंदू हित को ध्यान में रखकर एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने के लिये प्रयत्न कर रहे थे। उनका मरहठों के प्रति शस्त्र उठाना कोई अनुचित न था क्योंकि वे स्वयं हिंदू हित को ध्यान में रखकर एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने के लिये प्रयत्न कर रहे थे। और अपने आपको स्वतन्त्र समझते थे। किन्तु हिंदू जाति, हिंदू सभ्यता तथा हिंदू धर्म की रक्षा के लिये एक विशाल हिंदू साम्राज्य की आवश्यकता थी, चाहे यह राज्य किसी प्रणाली का होता और भारत के किसी प्रांत या किसी जाति द्वारा इसका शासन होता। यदि इस कार्य की पूर्ति के लिये मरहठे अग्रसर हुए और उन्हें अपने धर्मावलम्बियों के प्रति शस्त्र उठाना ही पड़ा तो इसके लिये वे दोषी नहीं ठहराये जा सकते। जैसा कि पहले कह आये हैं कि इन दोषों का उत्तरदायित्व या तो सभी हिंदुओं पर आता है या किसी पर भी नहीं, अतः हम केवल मरहठों को ही किसी प्रकार से भी दोषी नहीं ठहरा सकते। उन्होंने अपने बाहुबल द्वारा एक शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया, इसलिये उनका यह आशा करना उचित ही था कि अन्य हिंदू-सम्प्रदाय अपनी २ इच्छाओं को छोड़कर उन्हें अपना प्रभु समझें। यदि वे ऐसा करने के लिये उद्यत नहीं थे तो उन पर विजय प्राप्त करके