हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २२ ] उन्हें अपनी अधीनता स्वीकार कराने का मरहठों को सर्वथा अधिकार था । ३. प्राचीन और वर्तमान इतिहास के प्रकाश में सिंहावलोकन "ज्या प्रकारें वानरांकरवीं लंका घेवविली त्या प्रकारें हे गोष्ट झाली. सर्व कृत्यें ईश्वरावतारसारखीं आहेत. जे सेवक हे पराक्रम पाहत आहेत त्यांचे जन्म धन्य आहेत. जे कामास आले त्यांनीं तो हा लोक आणि परलोक साधिला । हे तर्दुद, हे मर्दूमकी, या समयांत हे हिम्मत, ही गोष्ट मनांसि कळवत नाहीं !" 𑁯 —ब्रह्मंद्र स्वामींचा पत्रव्यवहार यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने दूसरे सभी राजाओं पर विजय प्राप्त करने वाले तथा सम्पूर्ण राज्य की बागडोर संभालने वाले राजा के लिए भारत के राज्य-मुकुट से अपने मस्तक को सुशोभित करने तथा चक्रवर्तित्व की उपाधि को ग्रहण करने के अधिकार को न्यायसंगत तथा परम पवित्र भी माना है। चक्रवर्ती राज्य की प्रणाली में कुछ त्रुटियां तो अवश्य थीं किंतु इससे लाभ भी विशेष थे। हमारे पूर्वजों को यही उत्तम साधन सूझा था जिसके कारण राष्ट्रीय संगठन का विकास हो सकता था, जिसके कारण सारी हिंदू जाति की राजनैतिक तथा 𑁯 जिस प्रकार बन्दरों द्वारा लंका को जीता उसी प्रकार यह बात हुई। सब काम अवतारों के समान हुए। जो सेवक इस पराक्रम को देख रहे हैं उनका जन्म धन्य है। और जिन्होंने अपने जीवन का बलिदान किया उन्होंने इहलोक और परलोक दोनों साध लिये। उस समय के वीरों की युद्धकला, वीरता और साहस की हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते। —ब्रह्मंद्र स्वामी का पत्र व्यवहार।