भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 254 में से

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[ ८३ ] सार्वजनिक समानता तथा सार्वजनिक जीवन में एकता की शिक्षा दीक्षा दी जा सकती थी। देश के शासन की बागडोर लेने के लिये केवल वे ही लोग अग्रसर हुआ करते थे, जिनमें राजनैतिक निपुणता और संगठन करने की दक्षता रहती थी। यदि कोई पुरुष, जिसके द्वारा देश और धर्म के अहित होने की सम्भावना रहती थी, राजकुल में जन्म लेने के कारण इस पद के लिये प्रयत्न करता था तो देश के धार्मिक और योग्य पुरुष उसका साथ सदा छोड़ के लिये दिया करते थे और केवल योग्य व्यक्ति ही को सम्राट् के पद पर सुशोभित करने के पक्षपाती रहा करते थे। यही कारण था कि हिन्दू-राजनैतिक शक्ति का केन्द्र हस्त- नापुर, पाटलीपुत्र, उज्जैन, प्रतिष्ठाथान और कन्नौज इत्यादि भिन्न २ स्थानों और प्रान्तों में बदलता रहा। कभी कोई राजनैतिक संकट आ पड़ता तो उस समय सब विश्वविजेता राजा को अपना चक्रवर्ती महाराजा स्वीकार कर लिया करते और अपनी पिछली सारी शत्रुताओं को भूल जाया करते थे, क्योंकि लोगों का यह दृढ़ विश्वास हो जाया करता था कि इसी सम्राट् के द्वारा भारत देश और हिन्दू-धर्म की रक्षा हो सकती है। इस बात को लोग कभी ध्यान में नहीं लाते थे कि एक बार इसने उन्हें परास्त किया था, इसलिये इसका विरोध करना चाहिये, प्रत्युत् वे लोग उसका स्वागत करते थे। उन्हें यह ज्ञान था कि उसने चक्रवर्ती बनने के लिये जो उन्हें परास्त किया है इससे उनकी और उसकी शक्ति की परीक्षा हो गयी और यह सिद्ध हो गया कि वह देश और धर्म की रक्षा के लिये उनसे अधिक उपयोगी व्यक्ति है और उसके द्वारा भारतवासियों का अधिक कल्याण होगा। हर्ष और पुलकेशिन ने जब तक अपने सारे सहधर्मी प्रतिद्वंदियों को अपने अधीन न किया, तब तक वे क्रमशः उत्तर और दक्षिण में किसी भी प्रकार अपने साम्राज्य की उत्तम व्यवस्था न कर सके। इनके प्रतिद्वंदी राजाओं में बहुत से ऐसे थे जो इनके जाति या कुल के थे। इनके परिवार

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