हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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हिन्दुओं के भीतर संगठन रहता था। इसलिये पान-हिन्दू-सिद्धांत की दृष्टि से हमें इनकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये। जिन लोगों ने वीरता दिखाई और जय पाई और जो पराजित होकर मिट गये, हम उन दोनों को श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। हर्ष और पुलकेशिन भारत के इतिहास के दो सर्वप्रिय नाम हैं और हमें मगध, आन्ध्र, आन्ध्रभृत्य, राष्ट्रकूट, भोज और पांड्य इत्यादि राज्यों की स्थापना के ऊपर गर्व है। इनमें से प्रत्येक अपना राज्य चक्रवर्ती बनाने के लिए हिन्दुओं से ही लड़ा और इन लड़ाइयों में सहस्रों हिन्दुओं की जान गई, फिर भी हम इन राज्यों को किसी प्रकार से दोषी नहीं ठहराते। हम इस स्थान पर इस बात के ऊपर विचार करने के लिये नहीं रुक सकते कि उन्हें अपने राज्य को विस्तीर्ण करके चक्रवर्ती बनने के लिए कोई दूसरे उपयुक्त साधन थे अथवा नहीं, यदि थे तो लड़ाई न करके उन्हीं को क्यों प्रयोग में नहीं लाए? हमें यह भी मालूम है कि इनमें से बहुत से साम्राज्य हमारे ही प्रान्तों को कष्ट पहुंचाकर बड़े हुए, फिर भी इनके द्वारा जो जो सारी हिन्दू-जाति को लाभ पहुंचा, उसे दृष्टि में रखकर हम किसी प्रकार इन्हें दोषी नहीं ठहराते । मरहठे भी इन्हीं कारणों से, प्राचीन साम्राज्यों से अधिक विशाल, सुदृढ साम्राज्य स्थापित करने में सफल हुए। इस साम्राज्य की स्थापना में उन्हों ने अपने पूर्ववर्ती लोगों की अपेक्षा कम खून बहाया। उनकी भी अन्य हिन्दुओं और अन्य प्रान्त वालों के साथ कहीं-कहीं मुठभेड़ हो गई। इसके लिये उन्हें दोषी प्रमाणित करना भूल है। इसलिए प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है कि जातीय और प्रान्तीय भेद-भाव को छोड़कर उनकी उतनी ही प्रतिष्ठा और मान करे जितना पूर्वकाल के हिन्दू अपने चक्रवर्ती राजाओं का किया करते थे। नहीं नहीं, मरहठो का हमें अधिक प्रतिष्ठा करनी चाहिये, इस लिये कि जिन आवश्यकताओं के कारण मरहठा-आंदोलन आरम्भ हुआ वे पहिले आंदोलनों की आवश्यकताओं से अधिक महत्त्वपूर्ण थीं और मरहठों के आदर्श और ध्येय भी हर्ष और पुलकेशिन की अपेक्षा उत्तम