भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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[ २६ ] थे इसलिए उनके युद्ध और विजय का महत्व भी उतना ही उत्तम था । मरहठे केवल वीरता दिखलाने या अपने सुख और भोगों के प्रलोभन में पड़कर लड़ने के लिये उद्यत नहीं हुए थे; चक्रवर्ती बनकर प्रतिष्ठा के पात्र बनने के लिये भी वे लालायित नहीं थे; वरन् उनके ऐसा करने का मुख्य कारण यह था कि हिंदू-धर्म और हिंदू-जाति का अस्तित्व मिटने से बचे । महाकवि भूषण ने जो वर्णन किया है “काशीहू की कला जाती, मथुरा मसीत होती, शिवाजी न होते तौ सुनत होति सबकी”—अत्युक्तिपूर्ण नहीं है । तत्काल में हुई घटनाओं का उतना महत्व नहीं होता जितना महत्व उनके कुछ समय बीत जाने पर होता है । भूतकाल में किये गये शुभ कार्यों को लोग विशेष महत्व देते हैं और उन्हें श्रद्धा तथा भक्ति से देखते हैं । यह बात महाराष्ट्र के लिये भी चरितार्थ है । मरहठ-शूरवीरों ने देश और धर्म की जो सेवायें कीं वे विक्रमादित्य, शालीवाहन अथवा चन्द्र- गुप्त के समय के शूरवीरों द्वारा सम्पादित कार्यों से किसी तरह कम महत्ता नहीं रखतीं । इतिहास पढ़ने से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त का शासन-काल महत्वपूर्ण और ऐश्वर्ययुक्त था; किन्तु हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि उस समय हिंदू धर्म पर आपदायें इतनी भयंकर न थीं जो कि मरहठाकाल के समय आ रही थीं । यदि उस समय कोई आईं भी तो उन्हें दबाने के लिये चन्द्रगुप्त के पास पूर्ण साधन थे । विदेशी इतिहास सिकन्दर बादशाह के आक्रमण का बहुत बड़ा बतलाते हैं । किंतु वास्तव में देखा जाय तो उसके आक्रमण का प्रभाव केवल पंजाब पर पड़ा और वह उसी को विजय कर सका । हिंदूशक्ति का केन्द्र उस समय पाटलिपुत्र था, जहां पर उसका प्रभाव कुछ भी नहीं पड़ा । चन्द्रगुप्त की शक्ति और चाणक्य की नीति ने नन्द को राजसिंहासन त्यागने के लिये विवश कर दिया, कारण नन्द में म्लेच्छों को देश से निकालने की शक्ति न थी । चन्द्रगुप्त ने स्वयं 'महाराजा' की पदवी धारण करके यूनान वालों को भारतभूमि से निकाल दिया । चन्द्रगुप्त के समय से मरहठों के समय