हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३४ ] मिलता था। इस प्रकार पहल मरहटों के हाथ में ही रहती थी। वे अपने राज्य को सुरक्षित रखते और शत्रुओं के राज्य को उजाड़ देते थे। प्रायः ये लोग लड़ाइयों को टालते हुए इधर-उधर घूमा करते और शत्रुओं की रसदें मौका पाकर लूटा करते, विपक्षियों की प्रजाओं में भय का प्रसार करने तथा अन्त में शत्रुओं के सैनिकों में निराशा फैला कर उन्हें निरु- त्साहित कर देते थे। इसका फल यह होता था कि नियमित राज्य टूट जाता, राज्य का सारा प्रबन्ध बिगड़ जाना, लूट मार के कारण भोजन का भी अभाव हो जाना और देश में घोर दुष्काल पड़ जाया करता था। एक ओर तो वे शत्रु के कार्यक्रम में बाधायें डालते तथा आतंक फैलाते थे और दूसरी तरफ लडाई के खर्चे के लिये चन्दा लगाते और अनेक प्रकार के कर बढ़ा कर वसूल करते थे। इस प्रकार शत्रुओं को अपनी सेना, रक्षा और भोजन के साथ २ मरठों के लिये भी रक्षा और भोजन का प्रबन्ध करना पड़ता था। न तो शत्रु उनसे बच कर ही रह सकते थे, न उनका सामना ही कर सकते थे। शत्रु निराश होकर चिल्ला उठते थे “इन मरहटों से लड़ना हवा से लड़ना या पानी को पीटना है।” इस नीति का सर्वोत्तम उदाहरण राघोजी भोंसला के बंगला के युद्धों में मिलता है। हम पीछे लिख आये हैं कि हर साल बंगाल पर आक्रमण पर आक्रमण करके मुसलमान-नवाब को भोंसला ने इतना तंग कर दिया कि अन्त में परेशान होकर उसे उड़ीसा मरहटों को दे देना पड़ा और हिन्दू-पद-पादशाही के अधीन कर देने वाला राजा बन कर रहना पड़ा। इस युद्ध से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यह कहना ठीक नहीं कि यद्यपि शिवाजी के समय में शत्रुओं के देश और राज्य को नष्ट भ्रष्ट करने के वे उपाय ठीक थे, पर अब जब कि पेशवा बाकायदा मालगुज़ारी ले कर अपनी सेनाओं को रख सकते थे उन का लूट मार करना न्याय- संगत नहीं था। उसे इस लिये भी अनुचित नहीं कह सकते क्योंकि युद्ध की इस प्रणाली को उस समय सब राष्ट्र काम में लाते थे।