भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 231

का यह उद्देश्य होना था कि “कातरं केवला नीतिः शौर्यं श्वापदचेष्टितम्” । ॐ वे सदा ही ऐसे उपाय सोचा करते थे जिनके फलस्वरूप वे अपनी अपेक्षा शत्रु को अधिक हानि पहुंचा सकें। इस सिद्धांत को सामने रखकर ही वे प्रायः जम कर कहीं नहीं लड़ते थे, परन्तु जब कभी उन्हे कहीं जम कर लड़ना भी पड़ता था तो वे अपने सिर धड़ की बाजी लगा कर शत्रु का सामना करते थे और फिर यह नहीं सोचते थे कि उनको कितनी हानि होगी क्योंकि व सोचते थे कि इस समय उस असीम बलि- दान से उन्हें अन्त मे सफलता अवश्य मिलेगा और यदि वे इस समय बलिदान न देंगे तो उनको और भी अधिक हानि उठानी पड़ेगी । मरहठे पहले तो शत्रुओं के इर्द-गिर्द घूमा करते और उनके सर- दारों को जहां अकेला पाते मार डालते और उनकी छोटी २ टोलियों पर अपने स्थान से निकल कर धावा करके उन्हें व्याकुल करते रहते थे। यदि मरहठों का पीछा किया जाता तो वे भाग निकलते थे। जब पीछा करने वाले उनका पीछा छोड़ कर लौटना चाहते तब उसी समय मरहठे उन पर वज्र की की भांति टूट कर उनका सत्यानास कर देते थे। इस कौशल को उन्होंने इतना उपयोगी बनाया कि जब वे अपनी सेनायें लेकर निकलते थे तब शत्रुओं की भटकी हुई छोटी २ टुकड़ियों को रोकने या वध करने की बजाय उनकी बड़ी २ सेनाओं को घेर कर तहसनहस कर देते थे। होल्कर और पटवर्धन अंग्रेजों और मरहठों की पहिली लड़ाई में उपरोक्त नीति का अवलम्बन करके ही फलीभूत हुए थे। मरहठे अपने नेता महाराज शिवाजी के उपायों को महादजी शिन्दे और नाना फडनवीस के समय तक कार्य में लाते रहे। उनकी लड़ाई की दूसरी विशेषता यह थी कि वे लड़ाई आरम्भ होने से पहिले ही शत्रुओं की फौजों पर आक्रमण कर दिया करते थे, जिस से शत्रुओं को सिवाय अपनी रक्षा करने के लड़ने का अवसर ही नहीं ॐ युक्ति के साथ ही शक्ति का उपयोग करना चाहिये अन्यथा युक्ति के बिना शक्ति पाशविक बन जाती है।