हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 230, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ३२ ] घेरा सीमित करके और व्यूहबद्ध होकर अपने शिकार पर अकस्मात बिजली की भांति टूट पड़ते थे। और इससे पहले कि शत्रु परिस्थिति का अनुभव कर सके, नष्ट कर दिया जाता था। जब कभी मरहठों ने डट कर लड़ना चाहा, वे ऐसी बहादुरी और वीरता से लड़े कि शत्रुओं के दिल में आतंक जमा दिया और मुसलमान किसी प्रकार भी उनका सामना न कर सके। इसका प्रमाण हंबीर रावों की लड़ाई और बदायूं घाट की लड़ाई तथा और भी कई लड़ाइयों से मिलता है। इन लड़ाइयों से यह भी प्रकट होता है कि मरहठे जब लड़ना चाहते थे तब तो लड़ते ही थे किंतु जब कभी वे शत्रुओं के विवश करने पर भी लड़े तब भी उन्होंने उनके छक्के छुड़ा दिये। नवीन युद्धकला और आत्मबलिदान का सिद्धांत जो मरहठों को सदा प्रोत्साहित किये रखता था श्री रामदासजी के "शक्तिनें मिलतीं राज्यें युक्तिनें यत्न होतसे" * सिद्धांत पर आश्रित था। वे धार्मिक युद्ध के पुजारी थे, क्योंकि युद्ध के बिना न ही स्वतन्त्रता और न ही राज्य की प्राप्ति हो सकती थी। आत्म-बलिदान, असीम शौर्य आदि विशेषताओं के कारण ही वे भारत के स्वामी बन सके थे। परन्तु शक्ति से भी अधिक उन्होंने युक्ति का मान किया क्योंकि इसके बिना शक्ति पाशविक बन जाती है। वे अपना बलिदान देने के लिये तभी तय्यार होते थे जब उन्हें युक्ति पूर्वक यह निश्चय हो जाता था कि उनका यह बलिदान सफलता के लिये परमा- वश्यक है। उनकी यह दृढ़ धारणा थी कि जिस बलिदान से परिणाम में सफलता प्राप्त नहीं होती वह आत्मबलिदान नहीं कहलाता वरन् उसे आत्मघात कहना चाहिये। और मरहठा युद्धकला में ऐसे बलिदान के लिए कोई स्थान नहीं था। जब प्रातः स्मरणीय रामदास जी "शक्तियुक्ति जयें ठायीं। तेथें श्रीमंत नांदती" † का प्रचार करते थे तब उनके प्रचार
- शक्ति से राज्य की प्राप्ति होती है और युक्ति से कार्य सिद्ध होते हैं। † यहां पर शक्ति और युक्ति एक साथ होते हैं वहीं श्री का वास होता है।