भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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[ ५४ ] उसपर भी सन् १७९५ ई० से लेकर १८१८ ई० तक का समय, जिसमें महाराष्ट्र राज्य का विध्वंस हुआ, अभी शेष रह गया है और वह ऐसा रोमाञ्चकारी है कि उसका वर्णन बिना आंसू बहाये नहीं हो सकता। हम ऊपर देख आये हैं कि मरहठे, मुसलमानों के छः शताब्दियों के बढ़े हुए प्रभाव को सत्यानास करके थके हुए हैं और आराम करने के लिये जा रहे हैं। ठीक इसी समय एक शक्तिशाली राष्ट्र उसपर आक्रमण करता है जो पहले दो बार नीचा देखकर चुप होगया था। मरहठे तीसरी बार भी उन पर विजित हुए होते या उन्हें अवश्य भगा देते, किन्तु अभाग्यवश उसी समय नाना फड़नवीस मर गया और बाजीराओ दूसरा मरहठों का पेशवा हुआ जो कि शत्रुओं का निस्सन्देह दास था। यह दो व्यक्ति-नाना और बाजीराओ-द्वितीय परस्पर विरुद्ध वृत्तियों के प्रतीक थे—सारे महाराष्ट्र आन्दोलन में इन दो परस्पर विरुद्ध वृत्तियों का सदा संघर्ष चलता रहा है--एक वृत्ति तो स्वार्थ और राष्ट्रीय हित विरोधी आत्म-उन्नति की ओर बढ़ाती रही और दूसरी वृत्ति स्वार्थ त्याग तथा परोपकार का पाठ पढ़ाती रही जिस में मनुष्य आप राज्य मुकुट प्राप्त न करके अपने देश के गौरव के उत्कर्ष बढ़ाने और अपनी जाति को स्वतन्त्र कराने में सफल होता था। यद्यपि मरहठे इस कुवृत्ति को पूर्णतया नष्ट न कर सके तो भी उन्होंने नाना फड़नवीस के समय तक इसे विकसित नहीं होने दिया--इसी के फलस्वरूप वे हिन्दू-पद- पादशाही की स्थापना कर सके थे। बाजीराव द्वितीय अति स्वार्थी पेशवा था और किसी प्रकार और मरहठों से मेल और सहानुभूति नहीं रखता था। ज्योंही शासन की बागडोर इसके हाथ में पहुंची, इस पर विदेशी राष्ट्र के द्वारा आक्रमण हुआ। यदि वह राष्ट्र भारतवर्ष का होता या एशिया महाद्वीप के अन्तर्गत किसी राष्ट्र का होता तो मरहठे अवश्य विजयी हुए होते, क्योंकि एशिया के राज्यों में मरहठे सब से