हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५३ ] दानों और चित्तौड़ और विजयनगर की राजधानियों पर किये गये अत्या- चारों का बदला अच्छी तरह लिया । मरहठों ने छः शताब्दियों में प्राप्त की हुई मुमलमलानों की विजय को एक शताब्दी में मिटा दिया । यदि वे पूर्ण रीति से जगे होते तो अर्द्ध-शताब्दी भी न लगी होती । अब हम हिन्दुओं को उचित है कि इन शूरवीरों के द्वारा किये गये हिंदू-जाति के उपकारों के लिये सदैव उन्हें श्रद्धाभक्ति की दृष्टि से देखते रहें, सदैव कृतज्ञता प्रकट करते रहें और जिस बड़े राज्य को उन्होंने स्थापित किया था उसपर एक बार दृष्टिपात करलें, क्योंकि शीघ्र ही और अकस्मात् इस विशाल साम्राज्य के ऊपर परदा पड़ने वाला है और यह हम लोगों के सजल नेत्रों से ओझल हो जाने वाला है । ७. पटाक्षेप ॐ हिंमत सोडू नये सूर्य पुन्हा येइल उदयाला" —प्रभाकर यह सिंहावलोकन हमने सन् १७९५ ई० अर्थात् खारदा की लड़ाई तक किया है । पहले के सब वर्णन इसी काल से सम्बन्ध रखते हैं । हमारा उद्देश्य घटनाओं की गणना करने का नहीं था । हमारा उद्देश्य यही रहा है कि मरहठों के मुख्य - आदर्शों और सिद्धान्तों को जनता के सामने लायें और उनके उन मनोरथों और उद्देश्यों का पता लगायें जिनके लिये मरहठे देश की धर्मवेदी पर बलिदान देने के लिये प्रस्तुत हुए । और इन ही आदर्शों के प्रकाश में हिंदू जाति के इतिहास में मरहठों के इतिहास का स्थान निश्चित करें । यह कार्य समाप्त होगया। ॐ इस आशा को दृष्टि में रख कर कि भले दिन फिर कभी न कभी अवश्य उदय होंगे, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए ।