भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 40

[ ४० ] के रक्षक बने तथा शत्रुओं की पराधीनता से उन्होंने अपने देश को मुक्त कराया । तलवार ही मरहठों की पूज्या भवानी थी और भगवे रंग का था उनका झण्डा । उस झण्डे को महात्मा रामदास जी ने उठाया था, वीर शिवा उसी गेरुए झंडे की छाया में लड़ेथे और इसे सह्याद्रि पर्वत की चोटी पर ले जाकर उन्होंने स्थापित किया था। उसी को उनके पौत्र शाहू जी तथा उनके वंशजों ने किन्नर खण्ड की सीमा पर गाड़ने का दृढ़ निश्चय किया । इस प्रकार सभा समाप्त हुई और महाराष्ट्र मंडल का इतिहास सारे भारतवर्ष का आदर्श इतिहास बन गया । ८. दिल्ली की ओर प्रस्थान ❀ "अरे बघतां काय ! चला जोरानें चाल करून ! हिन्दूपादशाहीस आतां उशीर काय !" —बाजी रावो बाजीराव और उस के साथियों की शिवाजी की स्वायत्त में पूर्ण रूप से कैसी शिक्षा दीक्षा हुई थी तथा उन्होंने अपने महान नेता की राजनैतिक विद्या तथा युद्धकला का कितनी सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन किया था—इन दोनों बातों का स्पष्टीकरण शाहूजी के सभापतित्व में दिये गए बाजीराव के भाषण से भली भांति हो जाता है । बाजीराव ने महाराष्ट्र के नेताओं को संबोधित करते हुए अपने वक्तृत्व में कहा— "जिस समय शिवा जी दक्षिण में हिन्दू जाति की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए प्रयत्न कर रहे थे वह समय अत्यंत ही विकट और आपत्तियों से परिपूर्ण था । पर उस समय की अपेक्षा आज परिस्थिति हमारे अधिक ❀ अरे देखते क्या हो । शक्तिशाली बनो । हिन्दू-पद-पादशाही की स्थापना के लिए अब क्या देर है ।