हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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अनुकूल है। ऐसा सुअवसर मिलने पर, हम लोग उन के वंशज होते हुए भी उत्तरीय भारत में लड़ाई ठानने का साहस करने के स्थान पर नाना प्रकार की शंकाओं और विचारों में पड़े हुए हैं। इस समय हम निज़ाम, बंगश तथा मुग़ल सेनाओं पर बड़ी सफलता के साथ धावा बोल सकते हैं। सर्वप्रथम हमें निज़ाम के विरोध को नष्ट करना चाहिये क्योंकि वर्तमान काल में मुसलमानों में वही सब से सुयोग्य सेनापति और राजनीतिज्ञ है'। बाजीराव ने जिस प्रकार अपनी ओजस्विनी वाग् शक्ति द्वारा अपना मनोरथ सफलता पूर्वक महाराष्ट्र मण्डल के सामने प्रकट किया उसी प्रकार कर्मक्षेत्र में भी अपने आपको अपने कर्त्तव्य द्वारा शिवाजी का एक सुयोग्य शिष्य और अनुयायी प्रमाणित कर दिया। ७ अगस्त, सन् १७२७ ईस्वी को, जबकि मूसलाधार वर्षा हो रही थी, बाजीराओ अपनी शिक्षित सेना को लेकर रणक्षेत्र में कूद पड़ा और औरंगाबाद में प्रवेश करके उस पर विजय प्राप्त कर ली। उसके पश्चात् निज़ाम के अधीनस्थ जलना तथा आस पास के जिलों से अपने बाहुबल से लड़ाई खर्च का चन्दा वसूल करना आरम्भ कर दिया। ज्योंही निज़ाम की सेना इवाज़खां की अध्यक्षता में उसका मुक़ाबिला करने के लिये पहुंची बाजीराओ ने उन्हें अपनी चतुरता से थोड़ी देर तक निरुत्साहिता प्रकट करते हुए फंसाये रक्खा और फिर अचानक ही अपने दुश्मनों की सेना को छोड़ कर माहुर की ओर कूच कर दिया। फिर वहां से औरंगाबाद की तरफ बढ़ गया और यह बात फैला दी कि उस नगर से भी चन्दा वसूल किया जायगा। निज़ाम ने जब यह सुना तो वह उस धनी देश को बचाने के लिये, इवाज़खां के साथ सम्मिलित होने के उद्देश्य से शीघ्रता से उसी ओर बढ़ा। जब बाजीराओ ने अपनी इस चाल में सफलता देखी और देखा कि निज़ाम इस धोखे में आ गया है तो उसने खानदेश को छोड़कर गुजरात में प्रवेश किया और वहां के मुग़ल वायसराय को, विकट हंसी करते हुए, सूचना दे दी कि मैं इस देश पर निज़ाम की आज्ञा पा कर चढ़ाई कर रहा हूं।