हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४१ ] वह बड़ी बुरी तरह फँस गया । उसे अब दृढ़ विश्वास होगया कि अब मरहठों से छुटकारा पाना असम्भव है । वह विषाद सागर में डूब गया । अब उसके सामने दो ही रास्ते थे या तो वह अपनी सारी सेना को बरबाद करा लेता या बाजीराव की इच्छानुसार संधि करता । बड़ी उधेड़बुन के बाद निज़ाम ने अपने हृदय में बाजीराव से संधि करने का विचार निश्चित किया और शाहूजी को महाराष्ट्र का स्वतन्त्र राजा मान लिया और जितनी चौथ और 'सरदेशमुखी' बाकी थी सब पाई पाई देना स्वीकार कर लिया तथा इस शर्त को भी मान लिया है कि उसके राज्य में पुनः मरहठे 'कर' वसूल करने के लिये नियुक्त किये जायेंगे । इस प्रकार दोनों में संधि हो गई । इस उपरोक्त लड़ाई का विस्तारपूर्वक वर्णन यहां इसलिए किया गया हैक्योंकि यह मरहठा युद्धकला का आदर्श-स्वरूप उदाहरण है और इसमे यह भी प्रकट होता है कि महाराज शिवाजी ने अपनी जाति को जिन जिन शिक्षाओं से भली प्रकार शिक्षित किया था, उनके वंशजों ने उन्हे आज तक उसी प्रकार स्मरण ही नहीं रक्खा वरन् उन शिक्षाओं को और भी उन्नत किया तथा समयानुकूल घोर लड़ाइयों में प्रायः उन गुणों से बहुत ही काम लेकर विशेष सफलता के साथ विजय प्राप्त करते रहे । मालवा का मुगल वायसराय भी दक्खिन के मुगल वायसराय से किसी दशा में उत्तम सिद्ध नहीं हुआ । सन् १६६८ से लेकर, जबकि उदाजी पवार ने मालवा पर आक्रमण किया था और मण्डबा में अपना खेमा गाड़ दिया था, मरहठे लोग हर तरफ से मुगलों की सेना पर धावा करते रहे और उन्हें सुख की नींद न सोने दिया । उस प्रान्त के हिन्दू, जो मुसलमानों के अन्यायपूर्ण शासन से पीड़ित थे, अपने धर्म की रक्षा के लिये हर तरह विधर्मियों से सताये जाते थे । उन लोगों का भी, शिवाजी के उठाये हुये धार्मिक आन्दोलन के प्रति भाव बदला और वे अनुभव