हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७५ ] विपत्ति-सागर में डूब गया। नादिरशाह के साथ हिन्दुओं के विरुद्ध भाग लेने और भूपाल की सन्धि की शर्तों को पूरा करने में हीला-हवाला करने पर उसे यथेष्ट दण्ड देने के लिये मरहठे दिल्ली की तरफ बढ़े। ठीक उसी समय उनका सब से बड़ा अधिनायक बाजीराव २२ अप्रैल सन् १७४० ई० को, इस असार संसार से नाता तोड़ कर चल बसा। बाजीराव की मृत्यु के पश्चात् कोई भी दूसरा व्यक्ति हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के लिये उससे अधिक ईमानदारी और सफलता के साथ प्रयत्न न कर पाया। जब वह अभी बालक ही था, तभी से उसने अपनी जाति और धर्म के शत्रुओं के विरुद्ध तलवार उठायी थी और मरते दम तक उसे मयान में न डाला था। हिन्दू-धर्म के शत्रुओं का सामना करने के लिये सेना ले जाते समय खेमे में ही उनकी मृत्यु हुई। सभी बड़ी बड़ी कठिन चढ़ाइयों में जो उसने रुहेलों, सिङ्गो, मुगलों और पूर्तगेजों पर की थीं; कभी हार नहीं खाई थी। हिन्दू-पद-पादशाही के आदर्श को शीघ्रतम प्राप्त करने के लिये उसने जो अविश्रांत परिश्रम किया था वही उसकी अकाल मृत्यु का कारण हुआ। नादिरशाह की अंधड़जंन चढ़ाइयों से जितना धक्का हिन्दू-धर्म के आन्दोलन को लगता, उससे कहीं अधिक इस एक असाम- यिक मृत्यु के कारण लगा। ११ नाना तथा भाऊ ॐ "दशरथ देउनि राज्यश्रीस रामलक्ष्मणांच्या करीं "प्रभाततारा देउनि जाई कांति आपुली सूर्यकरों "तशीच बाजीरावे हिंदु स्वातंत्र्याची ध्वजा दिली "या नरवीर नानांच्या या भाऊंच्या दुर्दात करीं" - महाराष्ट्र भाट
- जिस प्रकार दशरथ ने राम लक्ष्मण के हाथों में राज्य लक्ष्मी को दे दिया, तथा जिस प्रकार प्रभात-तारा अपनी ज्योति सूर्य को समर्पण करके विलीन हो जाता है उसी प्रकार बाजीरावों ने हिन्दू-स्वतन्त्रता की ध्वजा नरवीर नाना और भाऊ के शक्तिशाली हाथों में दे दी।