भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 78

[ ७८ ] हिन्दुओं के तीर्थ-स्थान मदुरा पर चढ़ाई कर दी। हिन्दू-सेनापति मुसल- मानों को इस तरह फन्दे में फंसा देख लौट पड़े और त्रिचनापल्ली में तेजी के साथ जा पहुँचे। बड़े साहब ने, जो हिन्दुओं से बदला लेने के लिये तथा उनके तीर्थ-स्थान मदूरा को लूटने के लिये भेजा गया था, जल्दी से अपने भाई को सहायता पहुँचानी चाही पर राघोजी ने अपनी सेना का एक भाग भेज कर उसे बीच में ही रोक लिया। एक बड़ी भीषण लड़ाई हुई, जिसमें बड़ा साहब मर कर अपने हाथी से गिर पड़ा। मुसलमानों की पूर्ण हार हुई और उनके सरदार की लाश राघो जी के खेमे में लाई गई, जहां उसे कीमती कपड़े में लपेट कर राघो जी ने उसके भाई चन्दासाहब के पास भिजवा दिया। त्रिचनापली का घेरा महीनों तक जागे रहा। मुसलमानों ने अत्यन्त वीरता-पूर्वक मुक़ाबला किया पर उनसे कुछ न बन सका। अन्त में उन्हें उन हिन्दुओं से परा- जित होना पड़ा जिन्हें वे बड़ी घृणा की दृष्टि से देखा करते थे। राघोजी ने चन्दासाहब को क़ैद कर लिया और उसे सितारा भेज दिया और मुरारराव घोरपाड़े को १४ सहस्त्र सेना के साथ त्रिचनापली का प्रबन्ध करने के लिये नियत कर दिया। सफ़दरअली ने पहले ही मरहठों के सामने हथियार डाल दिये थे और उन्होंने इस शर्त पर उसे अरकाट का नवाब बनाना स्वीकार किया कि वह एक करोड़ रुपया मरहठों को दे; और उसके बाप ने सन् १७३६ में जिन हिन्दू-राजाओं को गद्दी से उतार दिया था, उन्हें फिर से राजा बनावे। जिस समय राघोजी दक्षिण में ऐसी सफलताएँ प्राप्त कर रहे थे उन्हीं दिनों बंगाल, बिहार और उड़ीसा के शासक अलीवर्दीखां से उसकी गवर्नमैंट की मुठभेड़ प्रारम्भ हो गई थी। मीर हबीब ने अलीवर्दी खां के खिलाफ मरहठों से सहायता मांगी और राघोजी के दीवान भास्करपन्त कोल्हाटकर ने, जो बंगाल की मुसलमानी शक्ति को नीचा दिखाने के सुअवसर की ताक में था, और चाहता था कि हिन्दू-राज्य की सीमा पूर्व में दूर तक बढ़ाई जाय, इस निमन्त्रण को प्रसन्नता-पूर्वक