हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७६ ] स्वीकार किया। १० हज़ार मरहठी घुड़सवार सेना मुस्लिम प्रतिष्ठा को धूल में मिलाती हुई बिहार पार करके बंगाल में जा पहुँची। अलीवर्दी खां ने, जो किसी प्रकार से भी निकृष्ट नेता नहीं था, ज्योंही उन लोगों पर चढ़ाई की, मरहठों ने उसे बड़ी बुरी स्थिति में डाल दिया। उसकी रसद बन्द कर दी और फौज को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और उसे वापस लौट जाने पर विवश कर दिया। मीरहबीब अली ने भास्करपन्त से प्रार्थना की कि वह अपने विचार बदल दें, बरसात-भर बङ्गाल में रहें और लड़ाई के हरजाने का चन्दा शत्रुओं से वसूल करें। इसके बाद मरहठे मुर्शिदाबाद पर चढ़ दौड़े जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने हुगली, मिदन पुर, राजमहल अर्थात् मुर्शिदाबाद को छोड़ कर, व २ गंगा के पश्चिम में स्थित बङ्गाल के सभी जिलों पर अधिकार कर लिया। मरहठों ने बङ्गाल में विधर्मियों को नीचा दिखाया और हिन्दुओं ने सफलता प्राप्त की। इसलिये धूमधाम के साथ काली की पूजा करना निश्चित किया गया। ठीक उसी समय अलीवर्दी खां ने हुगली नदी को पार कर के एकाएक मरहठों पर चढ़ाई कर दी और बङ्गाल की सीमा तक उनका पीछा किया। पर यह केवल थोड़े समय के लिये ही था, क्योंकि राघो जी शीघ्र ही लौट आया। बालाजी भी एक दूसरी मरहठी सेना का सेनापति होकर बिहार में आ पहुँचा। देखने में तो वह शाही जनरल की हैसियत से आया था, पर उसका वास्तविक उद्देश्य अपने लिये कर लगाना तथा राघोजी भोंसले के साथ अपना हिसाब-किताब तय करना था। राघोजी और बालाजी में समझौता होते ही बालाजी हट गया और भास्करपन्त ने युद्ध की क्षतिपूर्ति और चौथ मांगी। अलीवर्दी खां ने अपने आपको उसके साथ लड़ने में असमर्थ समझ कर एक नई मक्कारी की युक्ति सोच निकाली। उसने हरजाने के प्रश्न पर विचार करने के लिये एक मेहमान और राजदूत की तरह भास्करपन्त को अपने खेमे में बुला भेजा, और ऐसे हत्यारों को खेमे में छुपा रखने का प्रबन्ध किया जो अलीवर्दी