भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 254 में से

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खां के मुँह से "काफ़िर को मारो" की ध्वनि निकलते ही उनपर हमला कर दें। उस भयंकर दिन राघोजी गायकवाड़ को छोड़ कर लगभग २० मरहठे अफ़सर मारे गये और राघोजी मरहठों की घबराई हुई सेना को लेकर शत्रुराज्य से भाग गया। किन्तु विजयानन्द में मग्न मुसलमानी सेना उसे नाश करने के लिये बार बार उस पर आक्रमण करती रही। लेकिन मरहठों के उस आन्दोलन को, जिसे औरङ्गजेब की शाही शक्ति भी न दबा सकी थी, भला यह अचानक आक्रमण और हत्या क्योंकर दबा सकती ? अलीवर्दी खां ने राघोजी को एक हास्य तथा मूर्खतापूर्ण पत्र में लिखा था, "परमात्मा को धन्यवाद है, धर्मात्माओं के घोड़े अधर्मियों से नहीं डरते और इस्लाम के शेर के इस प्रकार कार्य्य- रत रहते हुये मूर्ति-पूजक राक्षस उसका कुछ नहीं कर सकते। अतएव अब हमारी दया के प्रार्थी बनो, क्षमा-याचना करो, तभी सुलह हो सकेगी, अन्यथा नहीं।" राघोजी ने इस मूर्खतापूर्ण पत्र का जवाब देते हुये लिखा कि जब मैं हजारों मील की यात्रा करके इस्लाम के शेर से लड़ने के लिये गया उस समय तो वह सौ मील चल कर भी युद्ध करने का साहस न करसका। और ऐसी शब्दाडम्बर की लड़ाई बन्द करके अली- वर्दीखां के निमन्त्रण को अस्वीकार करते हुये उसने मरहठे घुड़सवारों को बर्दवान और उड़ीसा पर चढ़ाई करने तथा उन पर कर लगाने की आज्ञा दी। मरहठे वर्षों तक अलीवर्दी खां को परेशान करते रहे और जहाँ- कहीं पहुँचे, उचित मालगुज़ारी लगा दी या मालगुज़ारी न लगा सकने पर युद्ध-व्यय का भारी चन्दा ही लगा दिया। वे सारे जिलों में फैल कर चारों ओर घूमने लगे और समयानुकूल कभी लड़ते, कभी भागते। अन्त में बङ्गाल, बिहार और उड़ीसा के सूबोंमें मुसलिम-शासक के लिये राज्य चलाना असम्भव कर दिया। मरहठे हार के डरसे रुकने वाले न थे और न नाश का ख्याल ही उन्हें निराश कर सकता था। उन्हें तो एकमात्र चौथ की ही चाह थी। अन्त में 'इस्लाम के शेर' अलीवर्दी खां को सन् १७५० ई० में इन