भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 81

[ ८१ ] “मूर्तिपूजक राक्षसों” से पूरा काम पड़ा, और ऐसा भीषण सामना हुआ कि लाचार होकर उसे क्षमा मांगनी पड़ी और भास्करपन्त को मारने के बदले उड़ीसा का राज्य, तथा बङ्गाल और बिहार पर १० लाख सालाना चौथ देने का भी वायदा करना पड़ा । इस प्रकार इस धर्म-रक्षकों को आखिर- कार मूर्तिपूजक-विधर्मियों से इस प्रकार क्षमा-याचना करनी ही पड़ी। क्या उन्होंने उस दिन भी अल्लाह का धन्यवाद किया होगा ? दूसरे मरहठा-सेनापति भी उत्तर भारत की दृढ़ मुसलिम-शक्ति को उसी समय अत्यन्त सफलतापूर्वक छिन्न-भिन्न कर रहे थे, जिस समय राघोजी भोंसले बङ्गाल में । हठी रुहेले और पठान जो अब तक यमुना से नेपाल तक की भूमि के स्वामी थे और जिन्होंने संगठित होकर एक शक्तिशाली सेना भी एकत्रित कर ली थी, मुगलों के विरुद्ध डटे हुए थे । मुगल-बादशाह के वज़ीर को डर था कि वे मुगलों का नाश करके भारत में पुनः पठान राज्य स्थापित करेंगे । उनकी इस अभिलाषा को धूल में मिलाने के लिए उसने मरहठों से सहायता मांगी ताकि वे उनको समूले नष्ट कर दें । मुगल राज्य का नाश स्वयं चाहते हुये भी मरहठों को यह पसन्द नहीं था कि उनके लाभ को कोई दूसरी मुसलिम-शक्ति उड़ा ले जाय । यही कारण था कि उन लोगों ने वज़ीर के निमन्त्रण को सहर्ष स्वीकार किया और उनके नेता मल्हरराव होल्कर और जयाजीराव शिन्दे यमुना नदी को पार करके कादिरगंज की ओर बढ़े । यहीं पठानों की सेना पड़ी थी । पठान बड़ी वीरता से लड़े पर उन्हें पराजित होना पड़ा । एक भारी विजय के साथ साथ मरहठों ने मुसलिम-सेना का नाश कर दिया और दूसरे पठान-सरदार अहमदखां को, जो बड़ी शीघ्रता से अपने कादिरगंज के मित्रों को सहयता पहुंचाने आ रहा था, घेर लिया । अहमद खां फर्रुखा- बाद में जा घुसा और उसकी मरहठों के साथ हफ्तों तक लड़ाई होती रही, पर उसकी शक्ति का ह्रास न हो सका क्योंकि उसको गङ्गा की दूसरी तरफ से रुहेलों की निरन्तर सहायता मिलती रही । अब मरहठों ने नाव का एक पुल बनाया और फ़ौरन कुछ सेना, जो फर्रुखाबाद को