भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 254 में से

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घेरे हुये थी, पीछे छोड़कर गंगा पार उतर गए और मुख्य सेना ने पठानों और रुहेलों की ३० हज़ार संयुक्त-सेना पर आक्रमण करके एक भीषण संग्राम के बाद उसे धूल में मिला दिया । उधर अहमदख़ां ने फ़र्रुखाबाद से भाग जाने तथा उस बची हुई मरहठा सेना को जीतने का निष्फल प्रयत्न किया । मरहठों ने उसका पीछा किया और मुसलमान सेना को तितर बितर कर दिया । खेमों, हाथियों घोड़ों और ऊंटों के साथ-साथ उनका सारा सामान लूट लिया गया । इस बार उनके हाथ बड़ा धन लगा और वीरता तथा सफलता-दोनों दृष्टियों से इस आक्रमण का वस्तुतः ही अत्युत्तम फल हुआ । मरहठों से द्वेष रख और धर्मान्धता का जामा पहन कर पठानों ने काशी पर आक्रमण करके हिन्दू-मन्दिरों और पंडितों के साथ बड़ा अन्याय किया था। वे डींगें मार रहे थे कि काफ़िर कभी पठानों का सामना नहीं कर सकते; क्योंकि ईश्वर उनकी (पठानों की) ओर है । बहुत हद तक यह बात ठीक भी थी क्योंकि मरहठों को कभी उनका सामना करने का सौभाग्य ही न प्राप्त हो सका था; क्योंकि जब कभी कोई खुली लड़ाई होने लगती तभी पठान पीठ दिखाकर भाग जाते थे । आखिरकार मुसलमानों की भारी हार हुई और दूर तक बुरी तरह खदेड़े गये, जिससे हिन्दुओं को अपने मन्दिर और घरों की अप्रतिष्ठा का पूरा-पूरा बदला मिल जाने से संतोष हो गया। उस समय का हिन्दू-साहित्य विजय-गाथा से परिपूर्ण है । उस समय के पत्र इस विजय ध्वनि में लिखे दिखाई पड़ते हैं— 'पठानों ने काशी और प्रयाग की अप्रतिष्ठा की थी, पर अंत में हरिभक्तों की ही विजय हुई····· शत्रुओं ने काशी में हवा का बीज बोया, पर ईश्वर की कृपा से फ़र्रुखाबाद में उसे आंधी के रूप में काट लिया गया।' धार्मिक सफलता के साथ साथ राजनैतिक सफलता भी कुछ कम न हुई क्योंकि मुसलमान-बादशाह ने डर कर मरहठों को अपने राज्य में चौथ वसूल करने की आज्ञा दे दी। मुग़ल राज्य का यही भाग