हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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शेष था, जहां मरहठे चौथ न लगा सके थे। इस तरह मुल्तान (सिंध) पंजाब, राजपूताना और रुहेलखंड भी उनके आधीन हो गये, और "हरिभक्त" शांतिपूर्वक रहने लगे। वे अब भलीभांति यह दावा कर सकते थे कि अब मरहठों ने मुग़लराज्य के वक्षःस्थल में अपनी संगीन घुसेड़ दी है। महाराष्ट्र-मंडल के नेता बालाजी ने इन महत्वपूर्ण घट- नाओं के समाचार पाकर अपनी सेना को लिख भेजा, "आप लोगों का साहस अनुपम और वीरता प्रशंसनीय है। दक्षिणा की सेनाओं ने नर्मदा, यमुना और गंगा को पार कर के रुहेलों और पठानों जैसे विकट शत्रुओं को पराजित करके उनका नाश कर दिया। सेनापति और वीरो ! आप लोगों ने वास्तव में असाधारण सफलता प्राप्त की है और आप ही इस हिन्दू राज्य के स्तंभ हैं। आपलोगों का नाम, ईरान और तूरान को पार कर बादशाह बनाने वालों की श्रेणी में हो गया है।" [ १७५१ ई० ] महाराष्ट्र मंडल के प्रमुख लोगों ने एक बार फिर काशी और प्रयाग को अवध के नवाब और दिल्ली के वज़ीर से वापस लेने का उद्योग किया। हिन्दू-स्वातंत्र्य-आन्दोलन के प्रतिनिधि होने के कारण वे काशी और प्रयाग जैसे सर्वोत्तम पुण्य तीर्थों को अब भी मुसलमानों के अधीन देखना अपमानजनक समझते थे। उस समय के पत्रों को पढ़ने से हमें पता चलता है कि मरहठे काशी और प्रयाग के लिये सर्वदा चिन्तित रहे हैं। किसी प्रकार किसी राजनैतिक चाल से काम चलता न देख मल्हरराव अधीर हो उठा और उसने यहां तक निश्चय कर लिया कि सीधे काशी पर हमला करके ज्ञानवापी के मन्दिर पर खड़ी मसजिद को गिरा कर हिन्दू-जाति के कलङ्क को सदैव के लिये मिटा दें, क्योंकि यह मसजिद हमेशा उन अशुभ दिनों की याद दिलाती थी जिन दिनों मुसलमानी हलाली झंडा हिन्दुओं के पवित्र मन्दिरों के खण्डहरों पर स्थापित हुआ था। लेकिन मुसलमानों के बदला लेने के डर ने ब्राह्मणों को भयभीत कर दिया था और उन्होंने मल्हरराव