हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसे प्रार्थना की कि जब तक कोई सुन्दर अवसर न आ जाय, तब तक हमले का विचार स्थगित रखिये। उन्होंने ऐसा इसलिए लिखा था क्योंकि काशी के आस पास अब भी मुसलमानों का अधिक आतंक छाया हुआ था। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कदाचित् काशी के इन ब्राह्मणों ने उसी पत्र में अपनी इस पवित्र चिन्ता को भी प्रकट किया हो कि हम लोग ही, जो अपने जीवन की रक्षा के लिये आप को काशी पर आक्रमण करके जातीयता का बदला लेने से रोक रहे हैं, उस पाप के भागी होंगे, क्योंकि आप को इस शुभ कार्य से रोक रहे हैं। सन् १७४६ ई० में शाहू जी का परलोक वास हो गया। तब से बालाजी ही, जिसे स्वयं शाहू जी "अधिष्ठाता" के अधिकार दे गये थे, महाराष्ट्रमंडल का अधिष्ठाता और जातीय मनोरथ और आदर्श का प्राण बन गया। यद्यपि घरेलू झगड़े और छोटे २ षड्यन्त्र जो राजमहल में हुआ करते थे, कभी कभी बड़ा भीषण रूप धारण कर लेते थे, तथापि इस योग्य शूरवीर ने इससे बेपरवाह हो, मुगलराज्य के स्थान पर मरहठों के आधिपत्य में एक स्वतन्त्र हिन्दू राज्य स्थापित करने का ध्यान ही प्रमुख रक्खा और इसके लिये अपने पूर्वजों से भी विशेष परिश्रम किया, यहां तक कि इस कार्य की पूर्ति के लिये उसे देशी, विदेशी, मुसलमान, ईसाई, एशियाई और यूरोपियन सभी से भारी लड़ाइयां लड़नी पड़ीं। विदेशियों में विशेषतः फ्रांसीसी दक्षिण में अधिक शक्तिशाली हो रहे थे और बालाजी भी इससे अनभिज्ञ न । पर उसे एक साथ ही हिन्दुस्तान के दूरस्थ भागों में भी बहुत से शत्रुओं के साथ युद्ध करना तथा उन असंख्य शत्रुओं का मुकाबिला करना पड़ रहा था, जो कि मरहठा-शक्ति का नाश करने का प्रयत्न कर रहे थे। इसलिये बालाजी ने उस समय फ्रेन्चों के साथ मत्था न लगाना ही श्रेयस्कर समझा। लेकिन राजनीति के दांव-पेंच की उलझन ने उसे उनके साथ