हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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प्रकार "श्रीरामदासजी" द्वारा शिवाजी को दिया हुआ "गेरुआ झण्डा" आख़िरकार हिन्दुस्तान की उत्तरी सीमा पर गाड़ दिया गया। हिन्दू 'अटक' पर पहुँच गये। पृथ्वीराज की पराजय के पश्चात् यह पहला ही मौका था जब श्रुति-प्रसिद्ध पवित्र सिन्धुतट पर हिन्दुओं की गौरवान्वित पताका फहराने लगी और युद्ध में विजयी हिन्दुओं के घोड़े उसका स्वच्छ जल-पान कर निर्भीक हो अपनी परछाहीं देखने लगे। मरहठों के इस विजय-समाचार ने हिन्दू जाति में बिजली का संचार कर दिया। अन्ताजी मानकेश्वर ने रघुनाथराव को लिख भेजा "लाहौर ले लिया गया, दुश्मन को भगा दिया गया और सीमा-प्रदेश तक उसका पीछा किया गया। हमारी सेना सिन्ध तक पहुँच गई। सचमुच यह बड़ा आनन्दप्रद समाचार है ! उत्तर के समस्त राजे, राव, सूबेदार और नवाब तथा अन्य लोग इससे प्रभावित होकर डर गये हैं। हमारी जाति के साथ किये हुए अत्याचारों का बदला केवल मरहठे ही ले सकते थे। सारे भारतवर्ष का बदला केवल उन्होंने ही अब्दाली से लिया। मैं अपने भावों को शब्दों द्वारा आपके पास भेजने में असमर्थ हूँ। वीरता के ऐसे काम किये गये हैं जो अवतारों की वीरता से कम नहीं हैं।" इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि स्वयं मरहठों को भी अपनी इस विजय पर विस्मय हुआ। द्वारिका से जगन्नाथ तक और रामेश्वर से मुल्तान तक, उनकी तलवार विजयी रही तथा उनके शब्द क़ानून बने। उन्होंने खुल्लम-खुल्ला भारत-राज्य के उत्तराधिकारी तथा रक्षक होने का ढिंढोरा पिटवा दिया और उन तमाम लोगों को, जो ईरान, तूरान या अफगा- निस्तान और इंग्लैंड, फ्रांस या पुर्तगाल से आये और इसमें बाधा डाली, नीचा दिखा कर अपनी मर्यादा की प्रतिष्ठा रक्खी। शिवाजी का 'हिन्दू-पद-पादशाही' का मनोरथ सामान्यतः पूरा हो गया। स्वामी रामदास की शिक्षा कर्तव्यरूप में परिणत हुई। मरहठे विजय-लाभ