हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ • • हित चौरासी अपना [मौन ध्यान आदि] व्रत छोड़ रखा है। [वे रसमग्न हुए रास नृत्य का दर्शन कर रहे हैं] प्यारी सखी! आज श्यामा (श्रीराधा) मग्न मन हैं रास में और मदन (प्रेम) की घनीभूत पीड़ा का हरण कर रही हैं।" टिप्पणी—"कलपतरु-नित्य रासस्थली श्री वृन्दावन में स्वर्गस्थ कल्पवृक्ष से अति विलक्षण और दिव्य कल्पतरु है जो चक्राकार सोलह दल युक्त कमल पर अवस्थित है। शास्त्रों में इसका विशद वर्णन है। महात्मा श्रीनन्द दासजी ने उस कल्पतरु का वर्णन इस प्रकार किया है- तिन मधि इक जु कल्पतरु लगि रही जग मग जोती। पत्र मूल फल फूल सकल हीरा मनि मोती॥ तिहिं सुर तरु मधि और एक अदभुत छबि छाजै। साखा दल फल फूलन हरि प्रति बिंब विराजै॥ तापै सोडस दल सरोज अदभुत चक्राकृति.... फिरि आये तिहिं सुरतरु तर सुंदर गिरवर धर। आरंभौ अदभुत सुरास उहिं कमल चक्र पर॥
- २५ - अवतरण — आज तत्सुख परायणा सखियों ने श्रीप्रियाजी को मज्जन कराके शृङ्गार से भूषित किया है। वे शृङ्गार सुसज्जित होकर प्रियतम श्रीलालजी से मिली हैं। श्रीहित सखीजी उनके तत्कालीन रूप, शील, लावण्य और शृङ्गार का वर्णन स्तुति व्याज से कर रही हैं। वे सखियों से बोलीं- धनाश्री मूल- आज नीकी बनी श्रीराधिका नागरी। ब्रज जुवति जूथ में रूप अरु चतुरई, सील सिंगार गुन सबनितें आगरी॥ कमल दक्षिण भुजा वाम भुज अंस सखि, गाँवती सरस मिलि मधुर सुर राग री। सकल विद्या विदित रहसि 'हरिवंश हित' मिलत नव कुंज वर स्याम बड़ भाग री॥२५॥