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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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हित चौरासी • • १०७ भावार्थ- “हे सखी ! आज नागरी राधिका बड़ी नीकी (सुन्दर) बनी हैं। वे समस्त ब्रज युवति समूह में रूप, चातुर्य शील शृङ्गार एवं गुण सभी बातों में सबसे बढ़ी-चढ़ी-श्रेष्ठ हैं। उनके दाहिने हाथ में कमल है और वे अपनी बायीं भुजा सखी के कन्धे पर रखे हुए सब सहचरियों से मिलकर सरस एवं मधुर राग का स्वर पूर्वक गान कर रही हैं।” श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं-(ये राधा) समस्त विद्याओं की ज्ञाता हैं। अहो! वे आज बड़भागी श्रीश्यामसुन्दर से रहस्य निकुञ्ज वर मन्दिर में (आनन्द पूर्वक) मिल रही हैं।”

  • २६ - अवतरण- शरद की राका रजनी में श्रीलालजी ने रासोत्सव प्रारम्भ किया है। उस समय भी जाने किस कारण श्रीप्रियाजी मानिनि बनी बैठी हैं। श्रीलालजी ने अपनी प्राण प्रियतमा को मना लाने के लिये परम चतुरा हित सखी को भेजा है। वे प्रियाजी के समीप दूतिका बनकर आयी हैं। दूतिका अपने उत्तम लक्षणों से पूर्ण है, अतः उसने नुति न्याय (चाटुकारी) पूर्वक नायिका श्रीराधा की स्तुति की। पश्चात् उसने आलम्बन (श्रीवन, शरद, रात्रि आदि) का वर्णन किया फिर नायक की प्रशंसा पूर्वक वह नायिका के हृदय में प्रेम मिलन की उत्कण्ठा जागृत करने लग गयी। परिणाम यह हुआ कि उसने भोली किंतु परम श्रेष्ठ नायिका श्रीराधा को प्रसन्न कर लिया और अन्त में श्रीलालजी से उसे मिला कर परम हर्षित हुई। इस पद में इसी रास मिलन का वर्णन है। हित सजनी (दूती रूप से श्रीराधा से) बोलीं- धनाश्री मूल- मोहनी मदन गोपाल की बाँसुरी। माधुरी श्रवन पुट सुनत सुनु राधिके, करत रतिराज के ताप कौ नासुरी।। सरद राका रजनि विपिन वृंदा सजनि, अनिल अति मंद सीतल सहित बासु री। परम पावन पुलिन भृंग सेवत नलिन, कल्पतरु तीर बलवीर कृत रासु री।।