हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ • • हित चौरासी सकल मंडल भलीं तुम जु हरि सौं मिलीं, बनी वर वनित उपमा कहौं कासु री। तुम जु कंचन तनी लाल मरकत मनी, उभय कल हंस 'हरिवंश' बलि दासुरी॥२६॥ भावार्थ- “हे राधिके ! सुनो ! मदन गोपाल श्रीकृष्ण की वंशी बड़ी मोहिनी है। उसकी तान माधुरी कर्ण पात्रों में पड़ते ही समस्त काम ताप का नाश कर देती है। हे सजनी ! देखो तो (कितनी सुन्दर) शरद् पूर्णिमा की रात्रि है, (शोभामय) श्रीवन है और अत्यन्त शीतल वायु धीरे धीरे सुगन्ध के साथ होकर बह रहा है, भ्रमर समूह कमलों का सेवन कर रहे हैं, ऐसे समय में बलवीर श्रीलालजी ने यमुना पुलिन कल्पतरु के तीर पर रासोत्सव की योजना की है।" (दूतिका की बात से प्रसन्न हो मान छोड़ कर श्रीप्रियाजी श्रीलालजी से जा मिलीं। उनसे मिल कर जो छटा प्रकट हुई उसे देखकर पुनः श्रीहित सखी बोलीं- "स्वामिनि!) देखो, इस समस्त युवती मण्डल में तुम्हीं एक परम सुन्दरी हो। (इस समय) श्रीलालजी से मिलकर जो तुम्हारी उत्तम बानक (छबि) प्रकट हुई उसकी मैं कौन सी उपमा दूँ ? (बस, इतना ही कह सकती हूँ कि तुम तो काञ्चन तनु हो और श्रीलालजी मरकत मणि जैसे हैं। तुम दोनों (प्रेम सरोवर श्रीवन के) सुन्दर हंस युगल हो। (इस हंस दम्पति पर मैं) हरिवंश दासी बलिहार हूँ-वारी जाती हूँ।" – २७ – अवतरण- यद्यपि श्रीवृन्दावन सदा ही वसन्त से अलङ्कृत है तथापि सहचरि गण के सुख और विनोद के लिये श्रीवृन्दा देवी वहाँ पर समयानुसार वसन्त वर्षा, शरद की ऋतु योजना करती रहती हैं। इस लीला क्रम से आज मानो पुनः परम रम्य यमुना तटी श्रीवन में ऋतुराज ने अपनी विजय दुन्दुभि बजायी है। और उसने रतिराज की समस्त सैन्य को आमन्त्रित किया है, यत्र तत्र उसके डेरे से पड़े हैं, तभी तो श्रीवन आज विलक्षण नूतनता लिये समस्त परिकर का मन चुरा रहा है।