हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १०६ बड़ा ही सुखद समय है, न अधिक ग्रीष्म है और न अधिक शीतलता ही। शीतल एवं सुगन्धित पवन सौरभ भार को लेकर व्यजन सा झल रहा है। लता विटपों के नव नव किशलय अपनी कोमल स्निग्धता से सबके हृदय में स्नेह का सञ्चार सा कर रहे हैं। विविध प्रकार के पुष्प अपने रङ्ग विरङ्गेपन से वृन्दावन को यों सजाए हुए हैं जैसे उसने बहुरंगमय दुकूल धारण कर रखा हो। यदि मालती, माधवी, मल्लिका, जूथिका जाति, जूही आदि के पुष्प अपनी सुगन्धि से समस्त वृन्दावन को परिमल प्रदान करते हैं, तो केतकी, मेदिनी और गुल्लाला अपनी रूप छटा से उसे श्री प्रदान करते हैं। कचनार बकुल और पलाश तो मदन की दुन्दुभि सी दे रहे हैं। समस्त परिकर का मन नई नई उमङ्गों से परिपूर्ण है-उल्लसित है। ऐसे उल्लासमय अवसर में युगल किशोर अनन्त सखि समूह से आवृत सरस धमार गाते हुए परस्पर एक दूसरे पर बूका बन्दन गुलाल अबीर फेंक फेंक कर परिहास पूर्वक रस का उद्दीपन करते हैं। कस्तूरी, केशर मलयज आदि से रङ्गों का निर्माण करके एक दूसरे पर उड़ेल देते और वस्त्रों को रँग देते हैं। इस परमानन्द पूर्ण प्रेमोल्लास विलास का वर्णन श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु इस प्रकार करते हैं- वसन्त मूल-मधुरितु वृंदावन आनँद न थोर। राजत नागरि नव कुसल किसोर।। जूथिका जुगल रूप मंजरी रसाल। विथकित अलि मधु माधवी गुलाल।। चंपक बकुल कुल विविध सरोज। केतकि मेदनि मद मुदित मनोज।। रोचक रुचिर बहै त्रिविध समीर। मुकुलित नूत नदित पिक कीर।। पावन पुलिन घन मंजुल निकुंज। किसलय सैन रचित सुख पुंज।।