हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० • • हित चौरासी मंजीर मुरज डफ मुरली मृदंग। बाजत उपंग बीना वर मुख चंग॥ मृगमद मलयज कुंकुम अबीर। बंदन अगरसत सुरँगित चीर॥ गावत सुंदरि हरि सरस धमारि। पुलकित खग मृग बहत न वारि॥ (जै श्री) हित हरिवंश हंस हंसिनी समाज। ऐसे ही करौ मिलि जुग जुग राज॥२७॥ भावार्थ- श्रीवृंदावन में वसन्त ऋतु छाई है, इसलिये आनन्द थोड़ा नहीं वरं अधिक है। (ऐसे समय में) नव नागरी (श्रीराधा) और चतुर किशोर (श्रीकृष्ण) शोभा पा रहे हैं। दोनों प्रकार की (श्वेत और पीत) यूथिकाएँ रूप मञ्जरी एवं रसाल (आम्र) फूल रहे हैं। माधवी और गुल्लाला के मधु पर अलिगण लुब्ध हैं-विथकित हैं। चम्पक और मौलिश्री (मौलसरी) के समुदाय, विविध प्रकार के सरोज केतकी, मेदिनी आदि भी मुकुलित हैं जिनके कारण मनोज भी मद से मुदित है। रोचक एवं सुखद सुन्दर त्रिविध पवन बह रहा है। फूले हुए आमों पर (बैठे) कीर कोयल मधुर मधुर नाद कर रहे हैं। सूर्य तनया यमुना के पावन पुलिन पर मञ्जुल एवं सघन लता भवन है जिसके अन्तर्भाग में सुख पुञ्ज शय्या बिछी है। (लता भवन के बाहर) मञ्जीर,मुरज डफ, मुरली, मृदङ्ग उपङ्ग वीणा और उत्तम मुख चङ्ग बज रहे हैं। (फाग खेल में) समस्त परिकर के वस्त्रादि कस्तूरी, मलय, केशर अबीर, बन्दन एवं अगर सत्व (इत्र) से सुरञ्जित हो रहे हैं। सुन्दरि श्रीराधा और श्रीहरि मिले रसमय धमार गा रहे हैं, जिसे सुन कर खग मृग सभी रोमाञ्चित हो उठे हैं, यमुना की धारा थकित है बह भी नहीं पाती है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं (हे युगल किशोर) तुम दोनों हंस हंसिनी का समाज इसी प्रकार युग युग-सदा सर्वदा मिल जुल कर राज्य करता रहे-सुख विलास ही करता रहे।