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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

हित चौरासी • • १११

  • २८ - अवतरण – वसन्त के सुहावने समय में श्रीवृन्दावन की अवर्णनीय शोभा है किन्तु श्रीप्रियाजी मानिनि बनी बैठी हैं। इस समय हित सहचरि ने श्रीवन की अपूर्व शोभा का दर्शन कराते हुए मानिनि प्रिया के मान का मोचन करने के लिये श्रीलालजी की प्रशंसा की। पश्चात् उद्दीपन विभाव श्रीवृन्दावन का वसन्त यश गान किया जिसे सुनकर मानिनी का मान छूट गया और वे प्रियतम से जा मिलीं। इस पद में इसी भाव का वर्णन है। श्रीहित सहचरि श्रीप्रियाजी से कहती हैं- वसन्त मूल-राधे देखि वन की बात। रितु बसंत अनंत मुकुलित कुसुम अरु फल पात।। बैंनु धुनि नँदलाल बोली, सुनिऽब क्यौं अर सात। करत कतऽब विलंब भामिनि वृथा औसर जात।। लाल मरकत मनि छबीलौ तुम जु कंचन गात। बनी (श्री) हित हरिवंश जोरी उभै गुन गन मात।।२८।। भावार्थ – "प्यारी राधे ! श्रीवृन्दावन की छटा तो देखो ! वसन्त ऋतु अनन्त पुष्प फल और पत्रों से मुकुलित है-खिली हुई है। (ऐसे समय में) वेणु ध्वनि के द्वारा श्रीनन्द लाल ने तुम्हें बुलाया है फिर (तुम उस ध्वनि को सुनकर भी) आलस्य क्यों कर रही हो ? हे भामिनि ! विलम्ब किस लिये कर रही हो, देखो (कैसा सुन्दर) अवसर व्यर्थ जा रहा है ! श्रीहित हरिवंश चन्द्र (सखी रूप से) कर रहे हैं-"अहा ! तुम दोनों की कैसी सुन्दर जोड़ी बनी है जो (दोनों ओर से) अनेक गुण समूह से मत्त है-परिपूर्ण है, जैसे श्रीलालजी मरकत मणि जैसे छविमय है वैसे ही तुम भी कनक वपु हो।"
  • २९ - अवतरण – श्रीकृष्ण आह्लादिनि, श्रीकृष्ण की हृदय भूषण स्वरूपा परम सुन्दरी, ब्रज नव तरुणि कदम्ब शिरोमणि नित्य नवल किशोरी श्रीराधा अपने