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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 117

११२ • • हित चौरासी रूप लावण्य, माधुर्य्य, यौवन, गुण, शील, हाव भाव, कौशल आदि सभी उत्तमा नायिकोचित रस एवं गुणों में सर्वापेक्षा अत्युत्कृष्ट हैं-अनुपमेय हैं ? वे श्रीकृष्ण की आराधनीया हैं कौन श्रीकृष्ण? पूर्ण पुरुषोत्तम प्रकट परावर नाथ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण बस, इससे अधिक और क्या कहा जा सकता है उनकी महिमा के सम्बन्ध में। और रस एवं श्रृङ्गार के क्षेत्र में भी उनसे श्रेष्ठ कोई नायिका नहीं है। उनके शुभ लक्षणों का सम्पूर्णतया वर्णन करने में सभी शास्त्र और उपनिषद् थकित हैं-हतप्रभ हैं। बस उनकी जैसी तो केवल वही हैं। वे रस रूपा हैं, रस भूषण हैं, रस निधि हैं, और रस दात्री भी हैं। भगवती श्रुति के सङ्केत रसो वै सः अर्थात् वह रस रूप है की यही प्रत्यक्ष मूर्त्ति हैं। इनका साक्षात्कार, अनुभव और रस पान करने पर ही श्रुति के रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति' अर्थात् निश्चय ही इस रस को प्राप्त करके (मनुष्य) आनन्द मय हो जाता है, इस वाक्य का साक्षात्कार होता है। अस्तु, यहाँ पर उन्हीं उपनिषदोपरि श्रीकृष्ण हृदयेश्वरी श्रीराधा के नख शिख रूप श्रृङ्गार का वर्णन श्रीहिताचार्य्य चरण शाखा चन्द्र न्याय से कर रहे हैं- देव गंधार मूल-ब्रज नव तरुनि कदंब मुकुट मनि स्यामा आजु बनी। नख सिख लौं अँग अंग माधुरी मोहे स्याम धनी।। यौं राजत कबरी गूँथित कच कनक कंज वदनी। चिकुर चंद्रिकनि बीच अरध विधु मानौं ग्रसित फनी।। सौभग रस सिर स्रवत पनारी पिय सीमंत ठनी। भृकुटि काम कोदंड नैन सर कज्जल रेख अनी।। तरल तिलक ताटंक गंड पर नासा जलज मनी। दसन कुंद सरसाधर पल्लव प्रीतम मन समनी।। चिबुक मध्य अति चारु सहज सखि साँवल बिंदु कनी। प्रीतम प्रान रतन संपुट कुच कंचुकि कसिब तनी।। भुज मृनाल वल हरत वलय जुत परस सरस श्रवनी। स्याम सीस तरु मनौं मिडवारी रची रुचिर रवनी।।