हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ११३ नाभि गंभीर मीन मोहन मन खेलन कौं हृदनी। कृस कटि पृथु नितंब किंकिनि वृत कदलि खंभ जघनी।। पद अंबुज जावक जुत भूषन प्रीतम उर अवनी। नव नव भाइ विलोभि भाम इभ विहरत वर करिनी।। (जै श्री) हित हरिवंश प्रसंसित स्यामा कीरति विसद घनी। गावत श्रवननि सुनत सुखाकर विस्व दुरित दवनी।।२९।। भावार्थ – (समस्त) व्रज की नव युवतियों के समुदाय में भी मुकुट मणि स्वरूपा श्यामा (श्रीराधा) आज बड़ी भली बनी हैं-शोभित हैं, जिनकी नख शिख पर्यन्त अङ्ग प्रत्यङ्ग माधुरी पर प्रियतम प्राणेश्वर श्रीश्याम सुन्दर मोहित हैं। अहा ! स्वर्ण कमल मुखी श्रीराधा गुँथे हुए केशों के जूड़े (कबरी) से ऐसी शोभित हैं मानो केश चन्द्रिका रूप फणि (सर्प) ने चन्द्र (रूप श्रीमुख कमल) को आधा निगल रखा हो। स्वयं प्रियतम श्रीलालजी ने आपका सीमन्त शृङ्गार किया है। वह सीमन्त शृङ्गार ही मानो (श्रीराधा के) सुहाग-रस की पनारी (धारा) सिर में बह रही है। भृकुटियाँ ही काम के धनुष हैं नयन बाण हैं और कज्जल की रेखा ही बाणों की नोंक हैं। ललाट पर तरल तिलक और कपोलों पर ताटङ्क झिलमिल झिलमिल कर रहे हैं, नासा पर सुन्दर मणि मुक्ता शोभित है। कुन्द कली जैसे दशन हैं और अधर पल्लव भी बड़े सरस हैं, ऐसी सरसधर पल्लवा श्रीराधा प्रियतम श्रीलालजी के मन की शान्ति करती हैं। हे सखि! चिबुक के मध्य में अत्यन्त सुन्दर स्वाभाविक श्याम बिन्दु कण (तिल) शोभित है। प्रियतम के प्राण रूप रत्नों की रक्षा करने वाले सम्पुट (डिब्बे) की तरह कुचों पर बन्धनों द्वारा कञ्चुकि कसी है। वलय सयुक्त भुज मृणाल स्पर्श करते ही बल का हरण करते और रस का सञ्चार करते हैं। श्याम तमाल विटप रूप श्रीश्याम सुन्दर के शीश को आवेष्टित करने वाली इस मिडवारी लता की रचना उन्होंने (श्रीप्रियाजी ने) कर रखी है। [अर्थात् श्री प्रियाजी ने श्रीश्याम सुन्दर के गलबहियाँ दे रखी है।] श्रीप्रियाजी की नाभि क्या है मानो मोहन के मीन मन के खेलने के लिये कुण्डिका है। श्रीराधा पतली कटि युक्त हैं। पुष्ट प्रथुल नितम्ब प्रदेश किङ्किणि से आवृत है तथा ये कदलि स्तम्भ जैसे जङ्घा वाली हैं। इनके चरण कमल जावक (महावरु) एवं भूषणों से