हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
DevanagariHindipublished275 पृष्ठ
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११४ • • हित चौरासी संयुक्त हैं एवं सदा प्रियतम की हृदय अवनी में विराजित हैं ये चरण। नवीन नवीन भावों के द्वारा भामिनि श्रीराधा प्रियतम को प्रलोभित कर कर के ऐसे विहार करती हैं जैसे मत्त गजराज के साथ उन्मत्त करिणि। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि मेरे द्वारा प्रशंसित श्रीश्यामा की कीर्त्ति पवित्र एवं अत्यधिक है, जिसका गान एवं श्रवण कर्ण पुटों के लिये सुख का समुद्र है और विश्व के समस्त पाप तापों का दमन शमन करने वाला भी।
- ३० - अवतरण - शरद मास की राका रजनी है। शीतल पवन धीरे-धीरे बह रहा है। सरोवरों में कमल विकसित हैं और वृन्दावन विभिन्न पुष्पों से अलङ्कृत है, मधु लोभी मधुप गण गुंआर करते हुए फूलों पर मँड़रा रहे हैं। श्रीप्रिया प्रियतम ने विविध प्रकार के किशलय दल एवं पुष्पों से एक मनोहर शय्या निर्मित की है और उस पर परम रसिक युगल किशोर विराजमान हैं, परम एकान्त कुञ्ज भवन में। निकट में न कोई सखियाँ हैं न दासियाँ ही। जब युगल रसिक रति रण से विथकित होकर प्रेम मूर्च्छा से विथकित हो जाते हैं, तब ललितादिक निज सहचरियाँ आकर उन पर व्यंजन आदि करने लगती हैं अपने अञ्चल से। वे इसे अपना परम सौभाग्य समझती हैं। इसका वर्णन श्रीहित सजनी अपनी किसी अन्तरङ्ग सखी से इस प्रकार करती हैं- देव गंधार मूल-देखत नव निकुंज सुनु सजनी लागत है अति चारु। माधविका केतकी लता लै रच्यौ मदन आंगारु॥ सरद मास राका निसि सजनी सीतल मंद सुगंध समीर। परिमल लुब्ध मधुव्रत विथकित नदित कोकिला कीर॥ वहु विध रंग मृदुल किसलय दल निर्मित पिय सखि सेज। भाजन कनक विविध मधु पूरित धरे धरनि पर हेज॥ तापर कुसल किसोर किसोरी करत हास परिहास। प्रीतम पानि उरज वर परसत प्रिया दुरावति वास॥