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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

हित चौरासी • • ११५ कामिनि कुटिल भृकुटि अवलोकत दिन प्रतिपद प्रतिकूल। आतुर अति अनुराग विवस हरि धाइ धरत भुज मूल॥ नागर नीवी बंधन मोचत ऐंचत नील निचोल। बधू कपट हठ कोपि कहत कल नेति नेति मधु बोल॥ परिरंभन विपरित रति वितरत सरस सुरत निजु केलि। इंद्रनील मनिमय तरु मानौं लसत कनक की बेलि॥ रति रन मिथुन ललाट पटल पर श्रम जल सीकर संग। ललितादिक अंचल झकझोरतिं मन अनुराग अभंग॥ (जै श्री) हित हरिवंश जथामति बरनत कृष्ण रसामृत सार। श्रवन सुनत प्रापक रति राधा पद अंबुज सुकुमार॥३०॥ भावार्थ- (श्रीहित सखी ने कहा-) "हे सजनी ! सुन तो सही ! यह नव निकुञ्ज देखने में कितना सुन्दर लगता है ! मदन ने माधवी, केतकी आदि लताओं से निकुञ्ज भवन बनाये हैं। शरद मास की पूर्ण राका रजनी है, शीतल एवं सुगन्धित पवन धीरे धीरे बह रहा है और सुगन्ध से लुब्ध भ्रमर मादकता के कारण विथकित हो रहे हैं। कोकिला और कीर गान कर रहे हैं। (ऐसे सुहावने काल में) विविध रत्नों के बहुत से मृदुल किशलय दलों से हे सखी ! श्रीलालजी ने शय्या रची है। वहीं पर अनेकों कनक घट नाना प्रकार के मधु आसवों से भरे भूमि पर संजोकर रख गये हैं। उस शय्या पर कुशल किशोर और किशोरी बैठे हास परिहास कर रहे हैं। प्रियतम अपने करों से प्रियाजी के वर उरोजों का स्पर्श करते और वे उन्हें अपने अञ्चल से छिपा लेती हैं। (प्रेम रोष से) कामिनि कुटिल भौंहों द्वारा प्रियतम की ओर देखतीं और सदा बात बात पर प्रतिकूल सी बनती हैं। किन्तु अति अनुराग से विवश और आतुर श्रीहरि झपट कर उनका भुज मूल पकड़ ही लेते हैं। नागर श्रीलालजी बलात् उनका नीबी बन्धन खोलते और नीलाम्बर खींचते हैं, तब कपट हठ (मिथ्या नहीं) का प्रकाश करती हुई कुपित होकर "नहीं, ऐसा नहीं, ऐसे मधुमय वचन कहती हैं।" (तदुपरान्त दोनों मिलकर) "एक दूसरे का आलिङ्गन करते और (दोनों ही) अपनी सरस सुरत रस केलि (निज केलि) द्वारा विपरीत रति का वितरण