हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें११६ • • हित चौरासी करते हैं, (रसिक जन सखियों के लिये।) सखि ! (उस समय की छबि ऐसी दीखती है,) मानो इन्द्रनील मणिमय विटप से स्वर्ण की लता लिपट रही है। रति युद्ध के श्रम से दोनों के ललाट पटल पर श्रम जल (प्रस्वेद) सीकर शोभित हैं और जिनके मनों में अभङ्ग अनुराग है ऐसी ललितादिक सहचरियाँ अपने अञ्चलों से पवन झकझोलती-वायु डुलाती हैं।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र इस श्रीकृष्ण रसामृत सार रति विहार का यथा मति वर्णन करते हैं जो श्रवणों में पड़ते ही श्रीराधा के सुकुमार पदाम्बुजों का प्रेम प्राप्त करा देने वाला हैं। टिप्पणी- (१) 'भाजन कनक विविध मधु पूरित धरे धरनि पर हेज,' चूँकि शास्त्र मर्यादा के अनुसार आसवों का पान करना हेय है और फिर भगवान् के लिये तो और भी विशेष; क्योंकि वे जैसा आदर्श उपस्थित करते हैं, उसी के अनुसार अन्य जन भी आचरण करते हैं किन्तु इस रस विहार-रसोपासना में न तो शास्त्रों का बन्धन है और न लोक वेद की मर्यादा ही। यह नित्य विहार सर्व तन्त्र स्वतन्त्र है। इस पर धर्म कर्म, लोक, वेद, शास्त्र आदि किसी का भी अनुशासन नहीं; क्योंकि- धर्म व्यतिक्रमों दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्। श्रीमद्भागवत १०/३३/३० अर्थात् 'धर्म के उल्लङ्घन कर देने का साहस ईश्वर में देखा जाता है।' उक्त प्रसङ्ग में यह बात ध्यान देने योग्य है कि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम और परात्पर ब्रह्म भी हैं। यदि उनके निखिल निगमागम अलक्षित रसमय नित्य विहार में उज्ज्वल रस की रीत्यानुसार आसवों (मादक द्रव्यों) का उपयोग है तो वह किसी प्रकार भी हेय नहीं और न कहा ही जा सकता है। यह तो लोक वेदातीत, मर्यादा से परे भावुक रसिक जनों के लिये है जो इसके अधिकारी हैं। उनका परिचय निम्न श्लोक से प्राप्त होता है- न जानीते लोकं न च निगम जातं कुल परं- परां वा नो जानत्यहह न सतां चापि चरितम्।