हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ११ श्रीवंशी अली जी श्री हरिवंश की यह वानि।। करत जे अनसहन निन्दक तिनहिं हित सरसान।। जान रस वस आस राधा वास महल निदान। कुंज सेवा पुंज विलसत गुंज गहि गहि पान।। सूर्य तनया निकट निजपुर नूत पल्लव वान। सखीजन की भीर भाजन लियें वहु विधि आन।। चरण चंचल पलक अचंल ढाँकि प्यारी पान। वदत वंशी अलिहि अंशी मत्त मुख रसखान।। श्रीकिशोरी अली जी हित विन कैसौ विपिन विहार। हित राजत प्यारी पिय के हिय हित ही सकल सुखन आधार। हित ही सौं सिंगार करावत हित ही भूषन वसन अपार। छिन छिन चोंज होत हितही के जुगल खिलौना हित खिलवार। हित की सेज बिराजत दोऊ हित कौ नवल निकुंज अगार। हित सौं फूलि रहीं बेली तरु शुक कोकिल गावत हितसार। यमुना पुलिन रास रचनादिक फैलि रह्यौ हित कौ विस्तार। श्री वनमें हित व्यापि रह्यौ है हित सौं हित ही कौ व्यौहार। सोई प्रगट भयौ हित हरि कौ सकल जगत कीनौ उद्धार। हित हरिवंश नाम के ऊपर अली किशोरी वलि वलिहार। श्रीप्रियादास जी गौड़िया श्रीहरिवंश गोसाई भजौ।। कुंजकेलि रस ही में सजौ।। हितजू की रीति कोऊ लाखनि में एक जानैं, राधा ही प्रधान मानै पाछै कृष्ण ध्याइयै। निपट विकट भाव, होत न सुभाव ऐसौ, उनहीं की कृपा दृष्टि नेंकु क्यौं हूँ पाइयै।।