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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

१२२ • • हित चौरासी

भगवान् श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान् शृङ्गार हैं। अनेक भाव प्रवण रसिक महानुभावों ने तो श्रीकृष्ण एवं उनके रस-शृङ्गार रस को साहित्यिक शृङ्गार रस से सर्वथा श्रेष्ठ उज्ज्वल रस कहा है, और है भी यही बात यथार्थ भी। क्योंकि जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण त्रिगुणातीत, पूर्ण आत्माराम, सच्चिदानन्द घन, स्वयं ज्ञान और अव्यक्त विभु हैं, उसी प्रकार वे श्रुति अतर्क्य, अवाच्य, अप्रकाश्य और केवल अनुभव गम्य है। इनके लिये भगवती जहाँ पर उक्त विशेषणों से पूर्ण शब्द देती हैं वहीं पर वह उन्हें "रसो वै सः," अर्थात् वह रस रूप भी है। ऐसा भी कहती है। अतएव अब यहाँ यह जानना आवश्यक हो जाता है कि वह उस "रस रूप ब्रह्म" का स्वरूप है क्या ? इस विषय का यहाँ पर संक्षेपतः निवेदन किया जाता है। ब्रह्मानुभूति की भाँति यह रसानुभूति केवल स्वानुभूति है-आत्मानुभूति है जो अवाङ्मनशगोचर और आलौकिक दिव्यानन्द है वही रस है। जहाँ प्राण, मन, आत्मा सभी किसी सात्विक एवं दिव्य प्रवाह में डूब कर परम स्निग्धता का अनुभव करने लगते हैं, वही रस की स्थिति है- वही प्रेम है। समस्त चराचर इसी रस के आस्वादन में आकुल है। फिर चाहे वह उसे अपने मन और इन्द्रियों का विषय बनाकर भोग रहा हो अथवा आत्मा का। अपने अपने स्तर में सभी उस रस रूप ब्रह्म का ही आस्वादन कर रहे हैं। किं बहुना ? चराचर जगत् ही रस रूप है, उस रस से अतिरिक्त कुछ अन्य है ही नहीं। भगवती श्रुति कहती है- "नेहनानाऽस्ति किञ्चन।" और इस चराचर व्यापी रस की प्रकट मूर्त्ति हैं श्रीराधा और श्रीकृष्ण। यही दोनों रस के दिव्य 'आलम्बन' हैं। इन्हीं से रस की स्थिति है और रस का विकास भी। श्रीवृन्दावन और सहचरि (युगल किशोर की नित्य सङ्गिनी सहेलियाँ ललिता विशाखा आदि) समाज इस उज्ज्वल रस के 'उद्दीपन' हैं। श्रीराधा और श्रीकृष्ण का पारस्परिक प्रेम ही रति है- 'स्थायी भाव' है। दोनों के बीच जिन जिन कारणों से स्थायी अनन्त रति का प्रकाश होता रहता है, वही 'विभाव' हैं। इसी प्रकार प्रेम पूर्ण कटाक्ष, भ्रू विक्षेप, हास, दर्शन, सङ्केत आदि इस रस के