हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १२१ श्रीव्यास सुवन पथ अनुसरै सोई भलैं पहिचानि है। श्रीहरिवंश गुसाईं भजन की रीति सकृत कोऊ जानि है।। भाव यह कि दम्पति के कुञ्ज केलि की खवासी निरन्तर करने वाली वह 'एका सखी' श्रीहित हरिवंश चन्द्र ही हैं। इसी प्रकार चाचा श्रीहित वृन्दावन दास जी भी कह रहे हैं- बन्दौं प्रेम खिलाड़ी दंपति उर जो है। कौतुक रचै जु भारी दोऊनि मन मोहै।। कौतुक रचे जु भारी वारी अति रस रूप छकावै। सदा सदेह रहै वृंदावन पिय प्यारी दुलरावै।। याके खेल रसिक जन परखैं थिर चर सब मन भावै। वृन्दावन हित रूप सहेलिनु चित जु चोज उपजावै।। इस छन्द में 'दंपति उर जो है' सदा सदेह रहै वृंदावन और पिय प्यारी दुलरावै, विशेष ध्यान देने योग्य हैं। और इस प्रेम के मूल परिचय का प्रवचन श्री ध्रुवदास जी से सुनिये- प्रकट प्रेम कौ रूप धरि श्रीहरिवंश उदार। राधावल्लभ लाल कौ प्रकट कियौ रस सार।। बस इन्हीं हित हरिवंश चन्द्र-प्रकट हित (प्रेम) की प्रति मूर्त्ति हैं ये आठों सखियाँ। यथा- मानौं आठौं मूरति हित की, -श्रीहित ध्रुवदासजी (३) कृष्ण रसामृत सार- यों तो साहित्य के नव रसों में, वीभत्स, रौद्र और भयानक भी रस हैं इसी प्रकार भोजन के छः रसों में कटु अल्म और तिक्त भी, किन्तु साहित्य में श्रृङ्गार और भोजन में मधुर का जो स्थान है उसे सभी लोग बिना विवाद किये ही मान रहे हैं-उन्हें मधुर और श्रृङ्गार को अत्युच्च या सर्वश्रेष्ठ स्वीकार करने में कोई आपत्ति ही नहीं। अस्तु; इतिहास, पुराण एवं शास्त्रों के मत से सिद्ध तो है ही और संत महात्माओं ने अपने अनुभव की छाप लगाकर और भी सिद्ध कर दिया है कि