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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 275 में से

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पृष्ठ 129

१२४ • • हित चौरासी जब बिछुरत तब होत दुख, मिलतहिं हियौ सिराइ। याही में रस द्वै भये 'प्रेम' कह्यौ क्यौं जाइ।। –प्रीति चौवनी ग. प्रवास– प्रियतम का प्रेमी से दूर हो जाना या अन्यत्र चले जाना ही प्रवास है। यह दो प्रकार का है, भूत प्रवास और भावी प्रवास। प्रवास से विरह की उत्पत्ति है। विरह के दश लक्षण हैं–अभिलाषा, चिन्ता, स्मरण, गुण गान, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जड़ता और मरण। कुछ विद्वान् गण ग्यारहवा लक्षण मूर्च्छा भी मानते हैं। इसी प्रसङ्ग में शृङ्गार रस के आलम्बन–नायक एवं नायिका की जाति गुण एवं अवस्थाओं का वर्णन अनावश्यक न होगा। जाति के अनुसार पद्मिनी एवं चित्रिणी श्रेष्ठ जाति की नायिकाएँ हैं और स्वभाव के अनुसार नायिका दश प्रकार की हैं; यथा–प्रोषित, पतिका, खण्डिता, कलहंतारिता, विप्रलब्धा, उत्कण्ठिता, वासकसज्जा, स्वाधीन पतिका अभिसारिका, प्रवत्स्य पतिका और आगत पतिका। श्रीजयदेव कविराज ने अपने 'गीत गोविन्द' काव्य में इन दशों लक्षणों को प्रायः श्रीप्रियाजी पर ही घटित किया है, क्योंकि वे भिन्न भिन्न स्थितियों में अलग अलग स्वभावों से अभिभूत होती हैं, तब वही उनका विशेषण होता है। अस्तु; इसके सिवाय उत्तमा, मध्यमा, अधमा, अन्य सुरत दुःखिता, मानवती, वक्रोक्ति गर्विता, प्रेम गर्विता, रूप गर्विता, गुण गर्विता आदि भेद नायिका के गुणों के अनुसार हैं। वय (उम्र) के अनुसार भी नायिका तीन प्रकार की हैं–मुग्धा, मध्या और प्रौढ़ा। भावों के अनुसार भी नायिका तीन प्रकार की है–स्वकीया, परकीया और गणिका। इनमें गणिका हेय–घृणास्पद है, अतः यहाँ उसका कोई प्रसङ्ग नहीं है। अस्तु; धर्मानुसार नायक भी अनेकों प्रकार के हैं, उनमें उत्तम नायक वही है जो धीर, ललित, प्रोषित पति, उप पति, अनुकूल, दक्षिण, वचन चतुर एवं क्रिया चतुर हो।

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