हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १२५ श्रीवृन्दावन के दिव्य रस विहार में स्वामिनि श्रीराधिका सर्वतोगुणोधिका नायिका हैं। उनमें सर्वोत्तमा नायिका के सभी लक्षण हैं। इसी प्रकार ललित नायक श्रीकृष्ण भी सर्व गुण सम्पन्न नायक हैं। रस विलास के लिये श्रीराधिका स्वकीया भी हैं और परकीया भी तथा स्वकीया परकीया से विलक्षण अनिर्वचनीया रसवती प्रेम पुत्तली। इसी तरह श्रीलालजी भी पति उप पति सभी कुछ हैं। आचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु द्वारा प्रकाशित मिलन-शृङ्गार में नित्य मिलन अखण्ड मिलन का ही अनवरत सुख है। वहाँ विरह मान आदि तो होंगे कहाँ से? उनका भ्रम भी नहीं है। फिर भी वहाँ विरह है पर रूप दर्शन की अतृप्ति रूप से, प्रेम की नवीन नवीन उत्कण्ठा के रूप में वह वहाँ बस रहा है। इसी प्रकार मान भी है पर प्रेम वैचित्य के रूप में। स्थूल मान की भाँति नहीं। यहाँ तक कि- देखत देखत कल नहिं माई। चाहत रूप में रूप समाई।। -हित ध्रुवदासजी श्रीवृन्दावन एक प्रेम मय देश है। वहाँ केवल प्रेम का ही राज्य है। युगल किशोर इस प्रेम राज्य के नरेश हैं। दुलहिनि राधा रानी हैं और दूलह हैं नवल किशोर श्याम। प्रजा हैं सखीगण, मृग, पक्षी और श्रीवृन्दावन का समस्त परिकर। युगल नरेश निरन्तर ललित यौवन के सिंहासन पर आसीन रहते हैं। उन पर रूप का छत्र भी तना ही रहता है। निकुञ्ज महल ही उनका राज्य प्रासाद है। और सखियाँ हैं सामन्त एवं सभासद गण। ये युगल नरेश सदा निर्भीक भाव से अपने अन्तरङ्ग महल में स्वच्छन्द विहार ही करते रहते हैं। इनके हृदय में मदन (प्रेम) की एक फुलवारी लगी है जो मानों इनके अङ्ग-अङ्ग में फूली हुई है। इस मदन बाग में मालिनिएँ हैं छहों ऋतुएँ जो सर्वदा सुख के फलों का उत्पादन करती रहती हैं। कभी कभी ये युगल नरेश मदन केलि की सतरञ्ज भी खेलते हैं। प्रतिक्षण रूव अवलोकन, हाव भाव एवं चितवन की ही चालें उस खेल में चली जाती हैं। दोनों के मन ही सतरञ्ज के वजीर (मन्त्री) हैं, जो रूख देख कर अपनी चाल चलते हैं। उरोज गयन्द और आँखें तुरंग हैं। पैदलों और (पयादों)