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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

१२६ • • हित चौरासी का काम करती हैं दोनों की नरम नरम अँगुलियाँ। जब श्रीप्रियाजी के कपोल तिल अलक छवि एवं मुसकान के बीच में श्रीलाल नृपति का मन मन्त्री फँस जाता है औरश्रीप्रियाजी अपने नयन तुरंगों को अटपटी चाल पर ला देती हैं, तभी लाल नृपति को मानों शैः (किश्त) दी जाती है। यह ऐसी शैः है जो खाली जाती ही नहीं जिससे नृपति की गति रुक जाती है और वे मात खा जाते हैं किंतु श्रीप्रियाजी जब खेल की परिसमाप्ति नहीं करना चाहतीं तब पुनः मात खाये हुए नृपति अधरामृत रस रूप अवसर देकर अपनी चाल वापस कर लेती हैं और राजा की विसातों को सम्हाल देती हैं। पश्चात् आलिङ्गन चुम्बन पूर्वक पुनः खेल प्रारम्भ हो जाता है और निरन्तर चलता ही रहता है इसी हार जीत के साथ। इस प्रकार इस नित्य मिलन का रस विलास अक्षुण्ण है। इसमें मिलन के साथ विरह और अतृप्ति ओत प्रोत है किन्तु किस रूप में उसे भी देखें- फूल सौं फूलनि सेज बनाई। अति सुगन्ध सौंधे छिरकाई।। नैंकु चितै तिरछे मुसकानी। लालहिं सुधि बुधि सबै भुलानी।। बसी जु प्यारे लाल उर, वह चितवनि मुसकानि। तबते कबहुँ छुटीनहिं, चुभी जु उर में आनि।। तिनकौं प्रेम और ही भाँति। अदभुत रीति कही नहिं जाति।। दिन संजोग में रहत हैं माई। सूक्ष्म प्रेम विरह दुखदाई।। देखत ही अनदेखी मानैं। तिनकी प्रीतहि कहा बखानैं।। प्रेम लालची लाल रँगीलौ। अवधि प्यार की रसिक रसीलौ।। कर अँगुरिनु भुज मूलनि परसै। अधर पान रस कौं जिय तरसै।।