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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 132

हित चौरासी • • १२७ छुवै न सकत उरजनि कर काँपैं। चतुर कुँवरि अंचल सों ढाँपै।। सो वह छटा प्रेम की न्यारी। लालहिं विवस करति अति भारी।। तबहिं सँभारि लेति सुकुमारी। अधर कपोलनि चूँवत प्यारी।। जब देखी अँखियानि उघारी। प्याइ जिवाये अधर सुधा री।। जबहीं उर सों घुरि लपटाहीं। तब नैना विरही ह्वै जाहीं।। छुटैं जबहिं छबि देख्यौ करैं। विरह आनि अंगनि संचरैं।। भाँति अटपटी सों चित हरयौ। जात नहीं उर धीरज धरयौ।। छिन छिन दसा और की औरै। थाँभै रहतिं सखी सिरमौरै।। प्रेम अटपटी चटपटी, रही लाल उर पूरि। और जतन ताकौ न कछु प्रिया सजीवन मूरि।। विरह सँजोग दिनहिं दिन माँही। जद्यपि ग्रीवनि मेलैं बाँहीं।। इहि विधि खेलत कलप विहाने। परम रसिक कबहूँ न अघाने।। –श्रीहित ध्रुवदास जी यह हुआ इस नित्य मिलन का विलक्षण नित्य विरह। अब देखिये इस नित्य विहार मिलन में साहित्य के नवों रस किस प्रकार इस एक मिलन में समाकर एक हो गये हैं। रसिक श्रीहित ध्रुवदासजी महाराज कहते हैं– १ प्रथमहिं चतवनि लाज की, शृङ्गार रस २ दुतिय मधुर मृदु बैन। करुणा रस