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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 133

१२८ • • हित चौरासी ३ तृतिय परस अंगनि सरस, उरजनि छबि सुख दैन ।। वीर रस ४ परिरंभन चुंबन चतुर, रौद्र रस ५ पंचम भाइ तरंग। हास्य रस ६ षट रस विंजन स्वाद जिमि, उठत अनंग तरंग ।। भयानक रस ७ विविध भाँति रति केलि कल, सप्त समुद्र अपार। वीभत्स रस ८ वचन रचन अष्टम, अद्भुत रस ९ नवम रस निधि रंग विहार ।। शान्त रस कुछ ऐसे ही श्रीभगवत रसिक जी ने भी नव रसों को एक ही शृङ्गार विहार में समावेशित कर दिखाया है। वे कहते हैं- पायँन परि विनती करें, सो रस मुख्य सिंगार१। मान छाँड़ि मृदु वचन कहि, करुणा२ रस निरधार।। सैना बैनी हास रस३, हथ्या बाँही वीर४। कंप भयानक५ जानिये, रौद्र६ छुड़ावै धीर।। रद छद में वीभत्स७ रस, अद्भुत८ प्रेम कौं देत। बूड़ि रहे सुख सिंधु में परम सांति रस९ हेत।। 'अनन्य निश्चयात्म' से इस प्रकार रस की मूर्त्ति श्रीलाड़िली लालजी रस में ओत प्रोत हुए अपनी समस्त क्रियाएँ रस वृद्धि पूर्वक रस सेवन के ही लिये करते रहते हैं। वे रस भरे नयनों से रस भरी चितवनों का विक्षेप करते और फिर रस के अनन्त आनन्दाम्बुधि में ही डूब जाते हैं तब उनके अन्तर्वहिः सिवाय रस-प्रेम के और कुछ रह ही नहीं जाता। श्रीहित ध्रुवदास जी कितनी सुन्दर शैली से इसका वर्णन करते हैं- प्यार ही की कुंज तामें प्यार की लै सेज रची, प्यार ही सौं प्यारो लाल प्यारी बातें करहीं।