हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १२६ प्यार ही की चितवनि, मुसकनि प्यार ही की, प्यार ही सौं प्यारीजू कौं प्यारो अंक भरहीं।। प्यार सौं लटकि रहैं प्यार ही सौँ-मुख चहैं, प्यार ही सौं प्यारो प्रिया अंक भुज धरहीं। 'हित ध्रुव' प्यार भरी प्यारी सखी देखें खरी प्यारै प्यार रह्यौं छाइ प्यार रस ढरहीं।। 'आनन्द दसा विनोद' से और इस रस की पराकाष्ठा है तल्प विहार। जिसका वर्णन श्रीहिताचार्य्य चरण ने यत्र तत्र सर्वत्र 'हित-चौरासी' में किया है। रसज्ञ पाठकगण उन प्रसङ्गों को देखें। हम अपनी असमर्थता चाचा श्रीहित वृन्दावन दास जी के शब्दों में प्रकट करते हैं- कुंज महल कौतिक जु अलौकिक दृग अनुरागी जानें। रसना लोचन हीन वापुरी कैसे छवि जु बखानै।। भाव हीन भावुक के हिय कौ मरम कहा पहिचानै। वृन्दावन हित रूप देसरा मती रसिक उर आनै।।
- ३१ - अवतरण - कलिन्द नन्दिनी के सुरम्य तट वर्त्ती मञ्जुल निकुञ्ज भवन में श्रीयुगल किशोर ने आज की सम्पूर्ण रात दिव्य अनिर्वचनीय सुरत रस विहार में व्यतीत की है। अब प्रातः काल हो आया है। दोनों उठे से बैठे हैं परस्पर एक दूसरे के स्कन्धों पर अपनी सुकोमल भुज लताएँ अलस भाव से डाले हुए। श्रीअङ्गों के समस्त वस्त्राभूषण अस्त व्यस्त हैं सम्पूर्ण शृङ्गार विगलित है। दोनों तल्लीन हैं, एक दूसरे की मुख माधुरी का पान करने में। ऐसे कि जैसे दो चन्द्रमाओं पर चार चकोर। अतृप्ति का ओर छोर नहीं। इसी दशा में कभी-कभी युगल किशोर मधुर स्वरों में गान करने लगते हैं और कभी भवनान्तर से निकल कर बाहर श्रीवन की ओर डगमगाते हुए चल पड़ते हैं। इस प्रातः कालीन छवि छटा को देख कर सखियों को परम आनन्द प्राप्त है। तथा स्वयं श्रीहित युगल के सुख से कितना सुख मिलता है