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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

१३० • • हित चौरासी इसका वर्णन वे स्वयं करती हैं। इस पद में प्रेम का अन्तिम सिद्धान्त 'तत्सुख सुखित्वम्' अर्थात् 'प्रियतम के ही सुख में सुखी होना' का सजीव और जागृत चित्रण है- देव गंधार मूल-आजु अति राजत दंपति भोर। सुरत रंग के रस में भीनें नागरि नवल किसोर॥ अंसनि पर भुज दियें विलोकत इंदु वदन विवि ओर। करत पान रस मत्त परसपर लोचन तृषित चकोर॥ छूटी लटनि लाल मन करष्यौ ये याके चित चोर। परिरंभन चुंबन मिलि गावत सुर मंदर कल घोर॥ पग डगमगत चलत बन विहरत रुचिर कुंज घन खोर। (जै श्री) हित हरिवंश लाल ललना मिलि हियौ सिरावत मोर॥३१॥ भावार्थ- आज प्रातः काल युगल किशोर दम्पति अत्यधिक शोभा पा रहे हैं। नागरी श्रीप्रिया और नवल किशोर श्रीलाल जी दोनों ही सुरतानन्द के रस में सराबोर हैं। दोनों परस्पर (एक दूसरे के) स्कन्धों पर अपनी अपनी भुजा दिये (अर्पित किये) एक दूसरे की मुख माधुरी का ऐसे पान कर रहे हैं जैसे प्यासे लोचन चकोर। श्रीप्रियाजी की विखरी हुई केश लटों ने श्रीलालजी का मन अपनी ओर आकर्षित कर रखा है, तो वे भी उनके चित चोर बन गये हैं। आलिङ्गन एवं चुम्बन पूर्वक कभी तो मन्द मन्द स्वर में कभी उच्च स्वर में दोनों मिले मधुर गान करने लग जाते हैं। पश्चात् डगमगाते हुए चरणों से कभी श्रीवन की कुओं, उपवनों और सघन गलियों में विचरण करने लगते हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं कि इस प्रकार श्रीलाल ललना (युगल किशोर) मिलकर मेरे हृदय को शीतल कर रहे हैं-शान्ति और सुख प्रदान कर रहे हैं। टिप्पणी- 'हियौ सिरावत मोर' युगल किशोर के सुख विहार से श्रीहित सखी किंवा अन्यान्य सखियों को सुख मिलता है, यही इस विहार की अपनी विशेषता है कि यहाँ भोजन एक

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