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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

हित चौरासी • • १३१ करता और दूसरे को तृप्ति मिलती-पुष्टि मिलती है। इसका कारण यह है कि समस्त परिकर ने अपना सुख उनके (युगल किशोर) के सुख में मिला दिया है। वे तत्सुख सुखित्वम् के सूत्र में ओत प्रोत हैं। यह तत्सुख के चिन्तन और धारण की भावना ही प्रेमी और प्रेम की सर्वोच्च स्थिति है। यहाँ तक कहा जा सकता है कि जब तक प्रेमी साधक में स्वसुख वासना की गन्ध भी है तब तक वह प्रेमी नहीं, वह प्रेम के धोखे मोह को बटोर रहा है। शृङ्गार रस के क्षेत्र में जहाँ नायक एवं नायिका अपना अपना सुख चाहते और एक दूसरे को सूख देने के नाम से सुख लूटते हैं वहीं पर युगल किशोर किंवा सहचरि गण अपनी समस्त भावना एवं क्रिया से एक दूसरे के सुखी करने में तल्लीन पाये जाते हैं। देखिये श्रीहिताचार्य्य पाद इसका सङ्केत किस प्रकार कर रहे हैं। श्रीलालजी सुरत विहार के मध्य काल में श्रम जल पूर्ण स्वामिनि को थकित श्रमित जान कर अपना सुख विस्मरण करके उनके सुख के लिये कह रहे हैं- 'विरमि विरमि' नाथ वदत वर विहार री। इससे बढ़कर तत्सुखित्व परायणता का कोई दूसरा उदाहरण कभी और कहीं भी न मिल सकेगा। इसी प्रकार सखियाँ भी कितनी तत्सुख परायणा हैं, कितनी निर्मत्सर हैं ? देखिये- जैश्री हित हरिवंश रसिक ललितादिक, लता भवन रंधनि अवलोकत। अनुपम सुख भर भरित विवस असु आनँद वारि कंठ दृग रोकत।। युगल की केलि का दर्शन करके ईर्ष्या और स्वसुख विलास की वासना का लेश भी नहीं है वरं अनुपम सुख का प्रवाह बढ़ रहा है जिसमें बहते हुए प्राण और आनन्द वारि को विवश किया जा रहा है रोका जा रहा है। व्रज लीला एवं व्रज रस में चन्द्रावली, ललिता एवं विशाखा आदि सखियों के अनेकों प्रसङ्ग हैं जिनमें श्रीराधा के प्रति कटाक्ष, द्वेष और मत्सरता के भाव