हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
१२८ • • हित चौरासी ३ तृतिय परस अंगनि सरस, उरजनि छबि सुख दैन ।। वीर रस ४ परिरंभन चुंबन चतुर, रौद्र रस ५ पंचम भाइ तरंग। हास्य रस ६ षट रस विंजन स्वाद जिमि, उठत अनंग तरंग ।। भयानक रस ७ विविध भाँति रति केलि कल, सप्त समुद्र अपार। वीभत्स रस ८ वचन रचन अष्टम, अद्भुत रस ९ नवम रस निधि रंग विहार ।। शान्त रस कुछ ऐसे ही श्रीभगवत रसिक जी ने भी नव रसों को एक ही शृङ्गार विहार में समावेशित कर दिखाया है। वे कहते हैं- पायँन परि विनती करें, सो रस मुख्य सिंगार१। मान छाँड़ि मृदु वचन कहि, करुणा२ रस निरधार।। सैना बैनी हास रस३, हथ्या बाँही वीर४। कंप भयानक५ जानिये, रौद्र६ छुड़ावै धीर।। रद छद में वीभत्स७ रस, अद्भुत८ प्रेम कौं देत। बूड़ि रहे सुख सिंधु में परम सांति रस९ हेत।। 'अनन्य निश्चयात्म' से इस प्रकार रस की मूर्त्ति श्रीलाड़िली लालजी रस में ओत प्रोत हुए अपनी समस्त क्रियाएँ रस वृद्धि पूर्वक रस सेवन के ही लिये करते रहते हैं। वे रस भरे नयनों से रस भरी चितवनों का विक्षेप करते और फिर रस के अनन्त आनन्दाम्बुधि में ही डूब जाते हैं तब उनके अन्तर्वहिः सिवाय रस-प्रेम के और कुछ रह ही नहीं जाता। श्रीहित ध्रुवदास जी कितनी सुन्दर शैली से इसका वर्णन करते हैं- प्यार ही की कुंज तामें प्यार की लै सेज रची, प्यार ही सौं प्यारो लाल प्यारी बातें करहीं।
हित चौरासी • • १२६ प्यार ही की चितवनि, मुसकनि प्यार ही की, प्यार ही सौं प्यारीजू कौं प्यारो अंक भरहीं।। प्यार सौं लटकि रहैं प्यार ही सौँ-मुख चहैं, प्यार ही सौं प्यारो प्रिया अंक भुज धरहीं। 'हित ध्रुव' प्यार भरी प्यारी सखी देखें खरी प्यारै प्यार रह्यौं छाइ प्यार रस ढरहीं।। 'आनन्द दसा विनोद' से और इस रस की पराकाष्ठा है तल्प विहार। जिसका वर्णन श्रीहिताचार्य्य चरण ने यत्र तत्र सर्वत्र 'हित-चौरासी' में किया है। रसज्ञ पाठकगण उन प्रसङ्गों को देखें। हम अपनी असमर्थता चाचा श्रीहित वृन्दावन दास जी के शब्दों में प्रकट करते हैं- कुंज महल कौतिक जु अलौकिक दृग अनुरागी जानें। रसना लोचन हीन वापुरी कैसे छवि जु बखानै।। भाव हीन भावुक के हिय कौ मरम कहा पहिचानै। वृन्दावन हित रूप देसरा मती रसिक उर आनै।।
- ३१ - अवतरण - कलिन्द नन्दिनी के सुरम्य तट वर्त्ती मञ्जुल निकुञ्ज भवन में श्रीयुगल किशोर ने आज की सम्पूर्ण रात दिव्य अनिर्वचनीय सुरत रस विहार में व्यतीत की है। अब प्रातः काल हो आया है। दोनों उठे से बैठे हैं परस्पर एक दूसरे के स्कन्धों पर अपनी सुकोमल भुज लताएँ अलस भाव से डाले हुए। श्रीअङ्गों के समस्त वस्त्राभूषण अस्त व्यस्त हैं सम्पूर्ण शृङ्गार विगलित है। दोनों तल्लीन हैं, एक दूसरे की मुख माधुरी का पान करने में। ऐसे कि जैसे दो चन्द्रमाओं पर चार चकोर। अतृप्ति का ओर छोर नहीं। इसी दशा में कभी-कभी युगल किशोर मधुर स्वरों में गान करने लगते हैं और कभी भवनान्तर से निकल कर बाहर श्रीवन की ओर डगमगाते हुए चल पड़ते हैं। इस प्रातः कालीन छवि छटा को देख कर सखियों को परम आनन्द प्राप्त है। तथा स्वयं श्रीहित युगल के सुख से कितना सुख मिलता है
१३० • • हित चौरासी इसका वर्णन वे स्वयं करती हैं। इस पद में प्रेम का अन्तिम सिद्धान्त 'तत्सुख सुखित्वम्' अर्थात् 'प्रियतम के ही सुख में सुखी होना' का सजीव और जागृत चित्रण है- देव गंधार मूल-आजु अति राजत दंपति भोर। सुरत रंग के रस में भीनें नागरि नवल किसोर॥ अंसनि पर भुज दियें विलोकत इंदु वदन विवि ओर। करत पान रस मत्त परसपर लोचन तृषित चकोर॥ छूटी लटनि लाल मन करष्यौ ये याके चित चोर। परिरंभन चुंबन मिलि गावत सुर मंदर कल घोर॥ पग डगमगत चलत बन विहरत रुचिर कुंज घन खोर। (जै श्री) हित हरिवंश लाल ललना मिलि हियौ सिरावत मोर॥३१॥ भावार्थ- आज प्रातः काल युगल किशोर दम्पति अत्यधिक शोभा पा रहे हैं। नागरी श्रीप्रिया और नवल किशोर श्रीलाल जी दोनों ही सुरतानन्द के रस में सराबोर हैं। दोनों परस्पर (एक दूसरे के) स्कन्धों पर अपनी अपनी भुजा दिये (अर्पित किये) एक दूसरे की मुख माधुरी का ऐसे पान कर रहे हैं जैसे प्यासे लोचन चकोर। श्रीप्रियाजी की विखरी हुई केश लटों ने श्रीलालजी का मन अपनी ओर आकर्षित कर रखा है, तो वे भी उनके चित चोर बन गये हैं। आलिङ्गन एवं चुम्बन पूर्वक कभी तो मन्द मन्द स्वर में कभी उच्च स्वर में दोनों मिले मधुर गान करने लग जाते हैं। पश्चात् डगमगाते हुए चरणों से कभी श्रीवन की कुओं, उपवनों और सघन गलियों में विचरण करने लगते हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं कि इस प्रकार श्रीलाल ललना (युगल किशोर) मिलकर मेरे हृदय को शीतल कर रहे हैं-शान्ति और सुख प्रदान कर रहे हैं। टिप्पणी- 'हियौ सिरावत मोर' युगल किशोर के सुख विहार से श्रीहित सखी किंवा अन्यान्य सखियों को सुख मिलता है, यही इस विहार की अपनी विशेषता है कि यहाँ भोजन एक
हित चौरासी • • १३१ करता और दूसरे को तृप्ति मिलती-पुष्टि मिलती है। इसका कारण यह है कि समस्त परिकर ने अपना सुख उनके (युगल किशोर) के सुख में मिला दिया है। वे तत्सुख सुखित्वम् के सूत्र में ओत प्रोत हैं। यह तत्सुख के चिन्तन और धारण की भावना ही प्रेमी और प्रेम की सर्वोच्च स्थिति है। यहाँ तक कहा जा सकता है कि जब तक प्रेमी साधक में स्वसुख वासना की गन्ध भी है तब तक वह प्रेमी नहीं, वह प्रेम के धोखे मोह को बटोर रहा है। शृङ्गार रस के क्षेत्र में जहाँ नायक एवं नायिका अपना अपना सुख चाहते और एक दूसरे को सूख देने के नाम से सुख लूटते हैं वहीं पर युगल किशोर किंवा सहचरि गण अपनी समस्त भावना एवं क्रिया से एक दूसरे के सुखी करने में तल्लीन पाये जाते हैं। देखिये श्रीहिताचार्य्य पाद इसका सङ्केत किस प्रकार कर रहे हैं। श्रीलालजी सुरत विहार के मध्य काल में श्रम जल पूर्ण स्वामिनि को थकित श्रमित जान कर अपना सुख विस्मरण करके उनके सुख के लिये कह रहे हैं- 'विरमि विरमि' नाथ वदत वर विहार री। इससे बढ़कर तत्सुखित्व परायणता का कोई दूसरा उदाहरण कभी और कहीं भी न मिल सकेगा। इसी प्रकार सखियाँ भी कितनी तत्सुख परायणा हैं, कितनी निर्मत्सर हैं ? देखिये- जैश्री हित हरिवंश रसिक ललितादिक, लता भवन रंधनि अवलोकत। अनुपम सुख भर भरित विवस असु आनँद वारि कंठ दृग रोकत।। युगल की केलि का दर्शन करके ईर्ष्या और स्वसुख विलास की वासना का लेश भी नहीं है वरं अनुपम सुख का प्रवाह बढ़ रहा है जिसमें बहते हुए प्राण और आनन्द वारि को विवश किया जा रहा है रोका जा रहा है। व्रज लीला एवं व्रज रस में चन्द्रावली, ललिता एवं विशाखा आदि सखियों के अनेकों प्रसङ्ग हैं जिनमें श्रीराधा के प्रति कटाक्ष, द्वेष और मत्सरता के भाव
१३२ • • हित चौरासी पाये जाते हैं। बहुनायक श्रीकृष्ण को बहुत कुछ कहा समझा जाता है चूँकि ये सभी भाव जगत् से परे और उस प्रेम राज्य के ही हैं, फिर भी अत्युज्ज्वल नित्य विहार और सर्वोपरि तत्सुखित्व से तो निम्न स्तर में ही हैं। तभी तो श्रीव्यास जी ने कह दिया- नवधा लौं सब भक्ति उबीटी, रति भागौत कथा की। रहनि कहनि सबहिनु तें न्यारी 'व्यास' अनन्य सभी की।। इस नित्य विहार परायण अनन्य सभा की 'रहनि कहनि' की यही पृथकता है कि वह पूर्ण तत्सुख परायण है।
- ३२ - अवतरण- प्रेम धाम श्रीवृन्दावन की अभिराम कुञ्ज के अन्तर्भाग में एक सुन्दर पुष्प पर्य्यङ्क बिछी हुई है। उस पर रसिक युगल किशोर पौढ़े हुए हैं और हास परिहास, वक्र अवलोकन, कच कुच स्पर्श, एवं आलिङ्गन आदि क्रीड़ाओं का सुख आस्वादन कर रहे हैं। समस्त वृन्दावन पुष्पों से सज सा रहा है। आकाश में चन्द्र देव क्रमशः ऊपर की ओर उठते हुए अपनी अमृतमयी शारदीय किरण मालाओं के हार-मृदु मृदु हार श्रीवन को अर्पित करते जाते हैं। शीतल पवन अपनी मन्द गति से सुगन्ध का प्रसार सा कर रहा है। ऐसे सुखमय अवसर राका रजनी में युगल किशोर अपने विशद विहार अनिर्वचनीय रस क्रीड़ा में संलग्न हैं, जिसका वर्णन श्रीहित सखीजी अपनी निकट वर्ती सहेली-ललितादिकों से कर रही हैं- देव गंधार मूल- आजु बन क्रीड़त स्यामा स्याम।। सुभग बनी निसि सरद चाँदनी, रुचिर कुंज अभिराम।। खंडत अधर करत परिरंभन, ऐंचत जघन दुकूल।
हित चौरासी • • १३३ उर नख पात तिरीछी चितवन, दंपति रस सम तूल॥ वे भुज पीन पयोधर परसत, वाम दृशा पिय हार। वसननि पीक अलक आकर्षत, समर श्रमित सत मार॥ पलु पलु प्रवल चौंप रस लंपट, अति सुंदर सुकुमार। (जै श्री) हित हरिवंश आजु तृन टूटत हौं बलि विसद विहार॥३२॥ भावार्थ—आज वन (श्रीवृन्दावन) में श्यामा श्याम क्रीड़ा कर रहे हैं। शरद की बड़ी सुन्दर चाँदनी पूर्ण रात्रि है और वैसी ही रुचिर अभिराम कुञ्ज है। (उस कुञ्ज भवन के खिलाड़ी श्रीराधा मोहन) युगल (दम्पति) रस विलास में समतुल्य हैं (कोई किसी से किसी बात में कम नहीं है।) परस्पर एक दूसरे के अधरों का चुम्बन, खण्डन, करते श्रीवपु का परिरम्भण (आलिङ्गन) करते और जघन भाग से (प्रियतम प्रियतमा का) दुकूल खींचते हैं, पश्चात् फिर भी उर (उरोजों) पर नखाघात करते एवं कटाक्ष पूर्ण नयनों से विलास पूर्वक अवलोकन करते हैं। जब कभी प्रियतम (अपनी प्रिया के) बाहु मूल और पुष्ट पयोधरों का स्पर्श करने लगते हैं तब श्रीप्रिया जी अपनी निगाहों से तिरछा अवलोकन करती हुई उनके हार का—उर स्थित हारावली के बहाने हृदय देश का स्पर्श करने लगती हैं। फिर कभी वस्त्रों में (ताम्बूल) पीक लगा देते, कभी ललित अलकों का ही आकर्षण करने लगते हैं और फिर शत शत स्मर व्यथा से उत्तप्त होकर रति विहार युद्ध से थकित हो रहते हैं किन्तु फिर भी अत्यन्त सुन्दर सुकुमार युगल रस लम्पट किशोर के मनों में रस विलास की चौंप प्रति पल प्रवल ही होती रहती है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि आज विहार अत्यन्त विशद है जिस पर तृण टूटते हैं अर्थात् जिस पर समस्त परिकर न्यौछावर है मैं भी उर वलिहार हूँ।
१३२ • • हित चौरासी पाये जाते हैं। बहुनायक श्रीकृष्ण को बहुत कुछ कहा समझा जाता है चूँकि ये सभी भाव जगत् से परे और उस प्रेम राज्य के ही हैं, फिर भी अत्युज्ज्वल नित्य विहार और सर्वोपरि तत्सुखित्व से तो निम्न स्तर में ही हैं। तभी तो श्रीव्यास जी ने कह दिया- नवधा लौं सब भक्ति उबीटी, रति भागौत कथा की। रहनि कहनि सबहिनु तें न्यारी 'व्यास' अनन्य सभी की।। इस नित्य विहार परायण अनन्य सभा की 'रहनि कहनि' की यही पृथकता है कि वह पूर्ण तत्सुख परायण है।
- ३२ - अवतरण- प्रेम धाम श्रीवृन्दावन की अभिराम कुञ्ज के अन्तर्भाग में एक सुन्दर पुष्प पर्य्यङ्क बिछी हुई है। उस पर रसिक युगल किशोर पौढ़े हुए हैं और हास परिहास, वक्र अवलोकन, कच कुच स्पर्श, एवं आलिङ्गन आदि क्रीड़ाओं का सुख आस्वादन कर रहे हैं। समस्त वृन्दावन पुष्पों से सज सा रहा है। आकाश में चन्द्र देव क्रमशः ऊपर की ओर उठते हुए अपनी अमृतमयी शारदीय किरण मालाओं के हार-मृदु मृदु हार श्रीवन को अर्पित करते जाते हैं। शीतल पवन अपनी मन्द गति से सुगन्ध का प्रसार सा कर रहा है। ऐसे सुखमय अवसर राका रजनी में युगल किशोर अपने विशद विहार अनिर्वचनीय रस क्रीड़ा में संलग्न हैं, जिसका वर्णन श्रीहित सखीजी अपनी निकट वर्त्ती सहेली-ललितादिकों से कर रही हैं- देव गंधार मूल- आजु बन क्रीड़त स्यामा स्याम।। सुभग बनी निसि सरद चाँदनी, रुचिर कुंज अभिराम।। खंडत अधर करत परिरंभन, ऐंचत जघन दुकूल।
१३४ • • हित चौरासी टिप्पणी-इस पद की वर्णना अन्य पदों से कुछ विलक्षण है। इस वर्णन में आदि से अन्त तक नायक एवं नायिका सर्वथा अनुकूल हैं और उस अनुकूलता में भी विलास की रमणीयता, सरसता एवं प्रियता की पराकाष्ठा हैं। जो लोग "नेति नेति वचनामृत" और "गौर श्याम भुज कलह मनोहर" में ही रस विशेष की सिद्धि मानते हैं वे- वे भुज पीन पयोधर परसत वाम दृशा पिय हार।' की झाँकी का अनुभव करें अपने भाव पूर्ण हृदय में। कितनी रस मयी है इसकी कल्पना ?
- ३३ - अवतरण- आज प्रातः काल श्रीनन्द नन्दन एवं वृषभानु नन्दिनी उनींदे ही उठ पड़े हैं और निकुञ्ज के अन्तर्भाग में डगमगाते चरणों से प्रेम विक्षिप्त की सी दशा में किंवा सुरतालस पूर्ण खुमारी में डूबे वहीं भ्रमण कर रहे हैं। युगल की इस दशा का दर्शन-अवलोकन करके श्रीहित सजनी अपनी सखियों से उसका वर्णन कर रही हैं- देव गंधार मूल- आजु बन राजत जुगल किसोर। नंद नँदन वृषभानु नंदिनी उठे उनींदे भोर॥ डगमगात पग परत सिथिल गति परसत नख ससि छोर। दसन बसन खंडित मषि मंडित गंड तिलक कछु थोर॥ दुरत न कच करजनि के रोकें अरुन नैन अलि चोर। (जै श्री) हित हरिवंश सँभार न तन मन सुरत समुद्र झकोर॥३३॥ भावार्थ- आज श्रीवृन्दावन में युगल किशोर यों शोभा पा रहे हैं कि नन्द नन्दन एवं श्रीवृषभानु नन्दिनी प्रातः काल ही उनींदे उठ पड़े हैं-रात्रि में पूरी तरह सो भी नहीं पाये (क्योंकि रति विहार के आनन्द ने मानों उन्हें सोने को कोई समय ही न दिया !) अतः चलते समय उनके चरण डगमगाते हैं और (गमन) गति भी शिथिल है। चलते हुए दोनों एक दूसरे को वसनाञ्चलों का-पट
हित चौरासी • • १३५ छोरों का अपने अपने नख चन्द्र से स्पर्श करते (-एवं आकर्षण करते हैं।) अधर क्षत विक्षत हैं, गण्ड मण्डल कज्जल से मण्डित है। ललाट पटल पर तिलक कुछ थोड़ा सा ही अवशेष रह गया है। अरुण नयन, जो चोर अलि-भ्रमर ही हैं केश राशि एवं उँगलियों के द्वारा छिपाये जाने पर भी नहीं छिपते -गोप्य रस पूर्ण रति विहार का प्रकाश किये ही दे रहे हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि सुरत समुद्र की झकझोर के कारण (आज दोनों को अपने अपने) तन एवं मन की भी सँभाल नहीं रह गयी है, (ऐसे रस मग्न हो रहे हैं!)
- ३४ - अवतरण - श्रीवृन्दावन में विचरण करते हुए युगल किशोर कभी एक कुञ्ज से निकल कर दूसरी में प्रवेश करते हैं कभी एक गली से होकर दूसरी में जाते हैं। कभी-कभी अत्यन्त सङ्कीर्ण लता विटपाच्छादित कुञ्जों से होकर निकलते समय पट वस्त्रों के उलझने की पूर्ण आशङ्का होने पर भी वे नहीं उलझ पाते कुछ कुशल कला से निष्क्रमण कर जाते हैं। गलवहिया देकर चलते हैं तो सही पर दो हैं ऐसा भी प्रतीत नहीं हो पाता। वन विहार के उपरान्त रात्रि को सुख मय सुरत विहार की क्रीड़ा का आनन्द वितरण करते हैं और इससे समस्त सहचरि समाज को किसी अनिर्वचनीय सुख में मानो डुबा देते हैं किंवा केलि वारिधि की अमृत लहरियों से भिंगा देते हैं। इसी वन विहार एवं रसमय सुरत विहार सुख का साङ्केतिक वर्णन श्रीहिताचार्य चरण अपने स्वस्वरूप (सखी भाव) के अनुसन्धान पूर्वक इस प्रकार करते हैं- देव गंधार मूल- वन की कुंजनि कुंजनि डोलनि। निकसत निपट साँकरी बीथिनु, परसत नाँहि निचोलनि।।
१३६ • • हित चौरासी प्रात काल रजनी सब जागे, सूचत सुख दृग लोलनि। आलसवंत अरुन अति व्याकुल, कछु उपजत गति गोलनि॥ नर्त्तनि भृकुटि वदन अंबुज मृदु, सरस हास मधु बोलनि। अति आसक्त लाल अलि लंपट, बस कीने बिनु मोलनि॥ विलुलित सिथिल स्याम छूटी लट, राजत रुचिर कपोलनि। रति विपरित चुंबन आलिंगन, चिबुक चारु टक टोलनि॥ कबहुँ श्रमित किसलय सिज्या पर, मुख अंचल झकझोलनि। दिन हरिवंश दासि हिय सींचत, वारिधि केलि कलोलनि॥३४॥ भावार्थ – अहह ! कितना विलक्षण है युगल किशोर का वन की कुओं कुओं का विहरण ? यद्यपि अत्यन्त सङ्कीर्ण (लता सघन) गलियों से होकर निकलते हैं फिर दोनों के निचोल वस्त्रों का लताओं से स्पर्श तक नहीं हो पाता (ऐसे एकमेक हो जाते हैं परस्पर में सँट कर चलते हुए !) आज दोनों सारी रात जागते ही रहे हैं जिसकी सूचना अब प्रातः काल इनके लोल लोल लोचनों से प्राप्त हो रही है जो दृग आलस्य मय, अरुण और अति व्याकुल हैं और नेत्र गोलक भी किञ्चित किञ्चत् गति उत्पन्न करते हैं, नेत्रों की पलकें शिथिल हैं- भार से झँपी हुई हैं। भृकुटियों में नर्त्तन है और वदन कमल में सरस हास के साथ हैं मधुर मधुर वचन। अतः सिद्ध है कि अत्यन्त आसक्त एवं लम्पट भ्रमर श्रीलालजी को श्रीप्रियाजी ने विना मोल के ही वश में कर रखा है- अपना वशवर्त्ती कर रखा है। रुचिर कपोलों पर बिखरी हुई काली शिथिल केश माला शोभा पा रही है।
हित चौरासी • • १३७ कभी विपरीत रति का विलास है, तो कभी चुम्बन, तो कभी आलिङ्गन ही और कभी चारु चिबुक का प्रेम पूर्ण उचकाव ही कभी कभी युगल किशोर रति विहार से श्रमित होकर किशलय शय्या पर पौढ़ ही जाते हैं और परस्पर में एक दूसरे के वदन पर अपने अपने वसनाञ्चलों से झकझोलन करने लगते वयार डुलाने लगते हैं। इस प्रकार दिन प्रति-निरन्तर 'हरिवंश दासी' के हृदय को अपने केलि वारिधि की लहरियों से सींचते ही रहते हैं। – ३५ – अवतरण – नव नव प्रभा मण्डित श्रीवृन्दावन धाम है। प्रातः काल का पुनीत समय है। साँवन की सुहावनी ऋतु है। सर्वत्र श्रीवन में हिण्डोल पड़े हैं। रस सने युगल किशोर मन चाहे हिण्डोलों में चढ़कर झूलते हैं। कभी वन हिण्डोल से झूलते हैं, तो कभी रति हिण्डोल रंग। श्रम से जनित चिह्न श्रीमुख पर प्रकट हो आते हैं जो रात्रि के विहार हिण्डोल की मानो सूचना सी देते हैं। अस्तु; श्रीहित सखीजी अपनी अन्तरङ्ग सखियाँ ललिता विशाखा आदि के साथ इस हिण्डोल विहार का सुख दर्शन करतीं और आनन्द में भर कर रस विहार की प्रशंसा करती हुई कहती हैं– देव गंधार मूल–झूलत दोऊ नवल किसोर। रजनी जनित रंग सुख सुचत अंग अंग उठि भोर।। अति अनुराग भरे मिलि गावत सुर मंदर कल घोर। बीच बीच प्रीतम चित चोरति प्रिया नैन की कोर।। अबला अति सुकुमारि डरत मन वर हिंडोर झँकोर। पुलकि पुलकि प्रीतम उर लागति दै नव उरज अँकोर।। अरुझी विमल माल कंकन सौं कुंडल सौं कच डोर। वेपथ जुत क्यों बनै विवेचत आनँद बढ्यौ न थोर।। निरखि निरखि फूलतिं ललितादिक विवि मुख चंद चकोर। दै असीस हरिवंश प्रसंसत करि अंचल की छोर।।३५।।
१३८ • • हित चौरासी भावार्थ—(आज) दोनों नवल किशोर (हिण्डोल) झूल रहे हैं। उठने पर प्रातः काल अङ्ग-अङ्ग से रात्रि जनित आनन्द सुख की व्यञ्जना-सूचना सी हो रही है। दोनों अत्यन्त अनुराग से भरे हुए कभी मंद मधुर तो कभी तार(उच्च) मधुर स्वर में गान करते हैं। बीच बीच में श्रीप्रियाजी अपने नयन कोरों से प्रियतम के चित्त की चोरी भी करती जाती हैं। श्रेष्ठ हिण्डोल की लम्बी झंकोरों (झूलों) से अत्यन्त सुकुमारी अबला श्रीराधा का मन डर जाता है तब वे बार-बार रोमाञ्चित हो होकर और मानो अपने नव उरोजों की भेंट (अँकोर) सी देकर प्रियतम के हृदय से डर के मारे चिपट-लिपट जाती हैं। तरल हिण्डोल की झूलों में प्रियतम के उर की विमल माल प्रिया के कङ्कण से और प्रिया की कच डोर प्रियतम के कुण्डलों से उलझ गये। उलझ तो गये पर अब तरल हिण्डोल में यह उलझन सुलझायी कैसे जा सकती है ? इस उलझन में थोड़ा नहीं अपितु अत्यधिक आनन्द बढ़ा। हिण्डोल पर शोभित नवल युगल किशोर के पारस्परिक युगल चन्द्रमुख और युगल क्यों चतुः चारु चकोरों को देख-देखकर ललिता आदि सखियाँ प्रसन्न हो रही हैं और 'हरिवंश' भी (वलिहार भाव से) सम्मुख अञ्चल तटी करके युगल को आशीष देते और प्रशंसा कर रहे हैं। – ३६ – अवतरण – यमुना के परम पावन पुलिन पर आज रसिक शेखर श्रीलालजी ने रास रस की सरस आयोजना की है। उस रास में किशोरी श्रीराधा के सहित समस्त सहचरियाँ नृत्य गान एवं वाद्य में समान रूप से भाग ले रही हैं। यदि नृत्य परायण हैं, तो कोई उच्च स्वर से गान होकर रही हैं और कोई वाद्य वादन प्रवीण सखियाँ बाजे ही बजा रही हैं। समस्त युवति मण्डल के बीच विराजमान (मध्यवर्ती) श्रीलालजी अपने सुललित कण्ठ से सारङ्ग राग आलाप रहे हैं और श्रीवृषभानु किशोरी उसी राग के अनुसार सुधङ्ग नामक नृत्य गति का प्रदर्शन कर रही हैं। इस अलौकिक आनन्द को देख कर सुर नायक-इन्द्रराज फूल उठते हैं और पुष्प वृष्टि करने लगते है।
हित चौरासी • • १३६ श्रीहित अलि जी इस शारदीय महारास का मधु मय वर्णन अपनी निज सखियों को सुना रही हैं- सारँग मूल-आजु बन नीकौ रास बनायौ। पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट मोंहन बैंनु बजायौ।। कल कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि खग मृग सचु पायौ। जुवतिनु मंडल मध्य स्याम घन सारँग राग जमायौ।। ताल मृदंग उपंग मुरज डफ मिलि रससिंधु बढ़ायौ। विविध विशद वृषभानु नंदिनी अंग सुधंग दिखायौ।। अभिनय निपुन लटकि लट लोचन भृकुटि अनंग नचायौ। ताता थेई ताथेई धरत नौतन गति पति ब्रजराज रिझायौ।। सकल उदार नृपति चूडामनि सुख वारिद वरषायौ। परिरंभन चुंबन आलिंगन* उचित जुवति जन पायौ।। वरसत कुसुम मुदित नभ नाइक इंद्र निसान बजायौ। (जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधा पति जस वितान जग छायौ।।३६।। भावार्थ-यमुना तटवर्त्ती सुन्दर एवं पवित्र पुलिन पर मोहन ने वेणु बजायी है और उन्होंने सुन्दर रास की रचना की है। रास में कङ्कण किङ्किणि एवं नूपुरों की मधुर मधुर ध्वनि को सुनकर खग मृग सभी सुख प्राप्त कर रहे हैं। युवति मण्डल के मध्य में विराजित श्याम घन ने (मुरली में) सारङ्ग राग जमाया है और उस स्वर से मिलकर बजते हुए ताल वाद्य मृदङ्ग, उपङ्ग, मुरज एवं डफ आदि रस समुद्र का विवर्द्धन कर रहे हैं। (रासोन्मत्त होकर) श्रीवृषभानु नन्दिनी जू ने अनेकों प्रकार से अपने विशद अङ्ग -सुधङ्ग का दिग्दर्शन कराया है। तथा उन अभिनय निपुण (श्रीप्रियाजी) ने लटक के साथ, ललित लोचनों को *'आलिङ्गन' और 'परिरम्भन'-चूँकि ये दोनों ही शब्द एक सा अर्थ रखते हैं तथापि यहाँ दोनों का प्रयोग विशेष विशेष अर्थों में किया गया है अर्थात् आलिङ्गन से साधारण भाव पूर्वक भेंट का अर्थ लेना चाहिये और परिरम्भण से अत्यन्त गाढ़ प्रीति के आलिङ्गन-भेंट से।
१४० • • हित चौरासी फेरते हुए अपनी भृकुटियों के नर्त्तन से कामदेव को भी नचा दिया- (लज्जित करके थकित कर दिया ।) साथ साथ तत्ता थेई, ता थेई' इन रास नृत्य सञ्चालक शब्दों के उच्चारण पूर्वक नृत्य की नव नव गतियों को लेती हुईं प्रियतम ब्रजराज किशोर को भी उन्होंने रिझा लिया, तब समस्त उदार नृपतियों के भी चूड़ामणि (श्रीलालजी) ने सुख वारिद की मानो वृष्टि सी कर दी। वह क्या वृष्टि की ? यह कि उन्होंने अपने प्रेम भाव का दान-आलिङ्गन, चुम्बन,; एवं परिरम्भण यथोचित रूप से समस्त युवति वर्ग को दिया किंवा उन युवतियों ने प्राप्त किया। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि इस आनन्द को देखकर नभ नायक इन्द्र राज पुष्प वृष्टि करते हुए दुन्दुभि बजा रहे हैं। इस प्रकार रसिक श्रीकृष्ण राधापति एवं श्रीराधा का यश वितान समस्त जगत् (विश्व) में छा गया। टिप्पणी-आलिंगन चुंबन परिरंभन उचित जुवति जन पायौ - श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु के रस सिद्धान्त के अनुसार श्रीराधा नवल किशोरी ही एकमात्र प्रियतमा हैं श्रीलालजी की; अन्य नहीं। ये नित्य विहारी श्रीराधा के अनुकूल एवं स्वाधीन पति हैं, बहुनायक नहीं। परिकर की अन्य सखियाँ दासियाँ हैं जो श्रीलालजी में प्रियतम भाव रखती हुईं सेवा की ही मात्र अधिकारिणि हैं। वे रस विलास साहायिका अवश्य हैं पर भोग्य-भोक्ता सम्बन्ध तो केवल युगल किशोर तक ही सीमित है। युगल के मिलन, भोग एवं समस्त सुखों का आयोजन करना ही सखियों का पूर्ण सुख है, क्योंकि सखियाँ पूर्णतया तत्सुखित्व भाव की प्रति मूर्त्ति हैं। किन्तु आज महारास के सुखोत्सव में सखियों ने रसिक प्रियतम श्रीलालजी की स्वेच्छा से (अपनी आकाङ्क्षा से नहीं) आलिङ्गन, चुम्बन, परिरम्भण, भ्रूकटाक्ष स्पर्श, हास आदि जाने कितने प्रकार से सुख प्राप्त किये हैं, अथवा उन्हें श्रीरसिक शेखर ने दिये हैं। श्रीकृष्ण एवं सखियों के इस दान सम्मान से उदार हृदया श्रीराधा सर्वेश्वरी स्वामिनी संतुष्ट हैं, सुखी हैं और उल्लसित हैं। वे अन्य अन्य सुरत दुःखिता नायिका की भाँति व्याकुल नहीं है। क्योंकि वे जानती हैं कि ये सखियाँ भी तो मेरा ही स्वांश रूपा हैं अतः स्वजन ही क्यों ? आत्मवत्
हित चौरासी • • १४१ अभेद रूपा हैं। इसीलिये इस महादान के अवसर में श्रीहिताचार्य चरण ने सावधानी पूर्वक विशेषण दिया श्रीलालजी के लिये- 'सकल उदार नृपति चूड़ामनि' अस्तु; सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर श्रीमद्भागवत वर्णित श्रीकृष्ण, उनके रास रस एवं श्रृंगार रस की लीलाओं एवं श्रीहिताचार्य द्वारा प्रकाशित श्रीकृष्ण रस सार में बहुत बड़ा अन्तर देखा पाया जाता है। देखिये; श्रीमद्भागवत वर्णित श्रीकृष्ण गोपियों के जार-उपपति तथा अनेक नारी नायक (बहुनायक) हैं उनका उन गोपियों के साथ रस काव्य की पद्धति के अनुसार रमण भी होता है, जो उनके अनङ्ग वर्द्धन वेणु गान को सुन कर रास में आयी हैं१। उन आयी हुई गोपियों के साथ श्रीकृष्ण हँसी ठिठोली, भ्रू विक्षेप, अलक स्पर्श, नखाग्र घात, हास परिहास, वाहु प्रसार (गलवाहियाँ), परिरम्भण, चुम्बन आदि नर्म क्रियाओं का व्यवहार करके उनके चित्तों में अनङ्ग उद्दीपन भी करते हैं२। इसी प्रकार गोपियाँ भी उनसे मिलन के समय अभिलाष भाव से मिलती हैं और रमण के प्रति जैसी चेष्टाएँ प्रियतमा की होनी चाहिये वही सब करती भी हैं। (देखिये श्रीमद्भागवत स्कन्ध १० अध्याय ३२ श्लोक ४,५,६,७,८ एवं स्क० १० अ०३२ श्लोक ११,१२,१३,१४।) गोपियों के आगमन के पश्चात् अन्तर्धान हो जाने के कारण वे श्रीकृष्ण को उलाहना भी
१-देखिये- एवं शशाङ्कांशु विराजिता निशाः, स सत्यकामोऽनुरताबलागणः। सिषेव आत्मन्यवरुद्ध सौरतः सर्वाः शरत्काव्य कथा रसाश्रयाः।। -श्रीमद्भा० १०/३३/२६ २. देखिये- बाहुप्रसार परिरम्भ करालकोरु- नीवीस्तनालभननर्म नखाग्रपातैः। क्ष्वेल्यावलोक हसितैर्व्रज सुन्दरीणा- मुत्तम्भयन्न्रतिपतिं रमयाञ्चकार।। -श्रीमद्भा० १०/२९/४६
१४२ • • हित चौरासी देती हैं और व्यङ्ग पूर्ण वचन कहती हैं ३। उन्हें श्रीकृष्ण की मुरली से किसी न किसी प्रकार का प्रेम मय अह अवश्य है तभी तो वे उसके प्रति व्यङ्गसा करती हुई कह देती हैं- गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्मवेणु- र्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्। भुङ्क्ते स्वयं यदवाशिष्ट..... -श्रीमद्भा० १०/२१/९ अर्थात् "गोपियो ! इस बाँसुरी ने जाने ऐसा कौनसा पुण्य किया है, जिससे यह गोपियों का भोग्य-दामोदर का अधरामृत स्वयं पीकर दूसरों के लिये केवल बचा खुचा ही छोड़ देती है। अस्तु; यह हुई श्रीमद्भागवत वर्णित श्रीकृष्ण के रस विलास की शैली और कथा किन्तु इससे अत्यन्त विलक्षण है श्रीहिताचार्य्य चरण का आराध्य तत्व। उनके श्रीकृष्णश्रीराधा पति, अनुकूल नायक, पति, सदा एक नारी व्रती, परम रसिक, प्रेमी, नित्य रास रस परायण, हित सुरत केलि कदम्ब विलासी, निखिल निगमागम अतर्क्य अभेद्य सकल मुनि जन अलक्ष्य और परात्पर भूमा पुरुष होकर ही प्रेम गरीब, अनन्त प्रेमी और सर्व सुलभ हैं। इन्हीं लक्षणों का प्रकाश श्रीहिताचार्य्य चरण के ग्रन्थों में यत्र तत्र सर्वत्र पाया जाता है। तात्पर्य यह रहा कि "आलिङ्गन, चुम्बन परिरंभन उचित जुवति जन पायौ" इस पंक्ति से श्रीमद्भागवत वर्णित श्रीकृष्ण का लक्षण घटित करना उचित नहीं वरं इस पंक्ति के विकास क्रम से श्रीहित तत्व श्रीकृष्ण को समझने ३-देखिये-गोपियों को अत्यन्त विरहाकुल देखकर श्रीकृष्ण उनके बीच में मुसकाते हुए प्रकट हो गये। तब वे सब गोपियों उनके प्रति प्रणय कोप सा प्रकट करती हुई- ईषत् कुपिता वभाषिरे-बोलीं- भजतोऽनुभजन्त्येक एक एतद्विपर्ययम्। नोभयांश्च भजन्त्येक एतन्नो ब्रूहि साधु भोः।। -श्रीमद्भा० १०/३२/१६
हित चौरासी • • १४३ की चेष्टा की जाय तो और भी उत्तम होगा। यह तत्व विवेचन की दृष्टि साम्प्रदायिक दृष्टि नहीं अपितु वस्तु का सूक्ष्म विवेक है-निदर्शन है जिसे चित्त की उच्च भूमिका में ही समझा जा सकता है, जहाँ पर महात्मा व्यास, ध्रुवदास, श्रीहरिदास और विहारिन देव जी आदि महा पुरुषों ने जाकर समझा। कुछ लोग तो इस तत्व विचार से इसलिये भी चौंक उठते हैं कि उनकी स्थूल दृष्टि में श्रीकृष्ण की अनेकता सी सिद्ध होती दिखती है, इन विचारों से; किन्तु बात ऐसी है नहीं। वरं इससे तो श्रीकृष्ण तत्व की महानता के साथ उपासना की महानता का प्रकाश मिलता है। वैसे तो श्रीकृष्ण सदा एक हैं केवल वे उपासना और भावना के ही विचार से राम, वामन, वाराह नृसिंह की भाँति, कन्हैया, पूतनारि, माखन-चोर, गोपाल, चीर-चोर, गोपीनाथ, रासविहारी, मथुरा-वासी, कंसारि, द्वारकावासी और जाने क्या क्या हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार श्रीहिताचार्य्य पाद उनके जिस अन्तरङ्ग रूप का प्रकाश करते हैं वह है- निकुञ्ज केलि विलासी और एक मात्र श्रीराधा प्रियतम। और गोपियों के साथ उसका"आलिंगन चुंबन पायौ" आदि विलास श्रीराधा प्रियतमा की इच्छा और कौतुक मात्र है। – ३७ – अवतरण – प्रिया श्रीराधा मानवती हैं; अतः श्रीलालजी से विलग किसी एकान्त कुञ्ज में विराजमान हैं। मानिनि प्रिया के वियोग से व्याकुल प्रियतम उनके बिना अब जीवन धारण करने में ही असमर्थ से हो रहे हैं। उनकी वियोग वलित दशा का वर्णन श्रीहित सखी स्वामिनि श्रीराधा से कर रही हैं-मानों इस वर्णन के बहाने उन्हें प्रियतम के निकट ले चलने के लिये बाध्य कर रही हैं। श्रीहित सखी अपने प्रयास में सफल भी होती हैं और अन्त में मानिनि प्रिया का का मान छुड़ा कर प्रियतम के निकट ला देती हैं। इस पद में ऐसी ही मान जनित विषम विरह व्यथा का वर्णन किया गया है-
१४४ • • हित चौरासी सारंग मूल- चलहि किन मानिनि कुंज कुटीर। तो बिनु कुँवरि कोटि बनिता जुत, मथत मदन की पीर॥ गदगद सुर विरहाकुल पुलकित, स्रवत विलोचन नीर। क्वासि क्वासि वृषभानु नंदिनी, विलपत विपिन अधीर॥ बंसी विसिख, व्याल मालावलि, पंचानन पिक कीर। मलयज गरल, हुतासन मारुत, साखा मृग रिपु चीर॥ (जै श्री) हित हरिवंश परम कोमल चित, चपल चली पिय तीर। सुनि भयभीत बज्र कौ पंजर, सुरत सूर रन वीर॥३७॥ भावार्थ-(हित सखी ने मानिनि प्रिया से कहा-) "हे मानिनि ! तुम कुञ कुटीर क्यों नहीं चलती हो ? देखो, तो कुमारी राधे ! तुम्हारे बिना श्याम सुन्दर को मदन की बाधा-पीड़ा एक साथ मथे डाल रही है, भले ही वे कोटि कोटि अन्य नारियों (सखियों) से घिरे हैं। (तुम्हारे बिना) उनकी वाणी गद् गद् है, शरीर रोमाञ्चित है, चित्त विरहाकुल है और उनके विलोचनों से (निरन्तर) जल झर रहा है। वे अत्यन्त अधीर होकर समस्त वृन्दावन में "हे वृषभानु नन्दिनी ! कहाँ हो ? कहाँ हो ??" ऐसा विलाप करते फिर रहे हैं। (तुम्हारे विरह में उनके लिये इस समय) वंशी बाण की तरह वक्षस्थल की मालाएँ सर्प की तरह एवं कोयल कीर (की मीठी बोलियाँ) सिंह (गर्जना) की तरह जान पड़ रहे हैं। (अरी ! और तो और) शीतल चन्दन भी विष (जैसा दाहक;) शीतल वायु अग्नि और वस्त्र तो शाखा मृग के रिपु-कमाच फल की तरह दुखः दायी हो रहे हैं।"
हित चौरासी • • १४५ श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि इतना सुनते ही परम कोमल चित्त श्रीराधा चपलता पूर्वक (शीघ्र) प्रियतम के समीप चल पड़ी। उन सुरत शूर वीर का आगमन सुनकर वज्र पञ्जर काम भी भय से भीत हो उठा, काँप गया।* *इस पद में जैसी दशा श्रीराधा विरह में श्रीकृष्ण की वर्णित की गयी है, ऐसी ही दशा का वर्णन श्रीजयदेव कविराज ने अपने 'गीत गोविन्द' काव्य में श्रीकृष्ण विरहिणी श्रीराधा की किया है। इन दोनों वर्णनों में भावों का सामञ्जस्य है पात्र भेद से स्वयं रति वञ्चिता राधा (मानवती नहीं) अपनी दशा का वर्णन अपनी सखी से कर रही हैं- रिपुमिव सखी संवासोयं शिखीव हिमानिलो, विषमिव सुधा रश्मिर्यस्मिन् दुनोति मनोगते। हृदयमदये तस्मिन्नेवं पुनर्वलते वलात्, कुवलय दृशां वामः कामो निकाम निरङ्कुशः॥ अर्थात् श्रीराधा ने कहा-“हे सखि ! यह लता भवन का निवास इस समय तो वैरी जैसा लग रहा है, शीतल वायु भी अग्नि ज्वाला की तरह हो गया है और ये सुधामयी चन्द्र किरणें भी तो विष जैसी मन के लिये दुःख दायी हो रही हैं ! तिस पर फिर यह निर्दय हृदय हीन निरङ्कुश काम अकारण ही हमारा वाम-उलटा हो रहा है तथा हम कमल नयनी वाम दृशाओं का हनन कर रहा है। अरी ! इसका यह कृत्य तो मानो मरे को भी मारने जैसा निन्द्य है !” इतना कहने के पश्चात् वे फिर अपने आप प्रलाप सा करने लगती हैं- बाधां विधेहि मल्यानिल पञ्च वाण प्राणान् गृहाण न गृहं पुनराश्रयिष्ये। किं ते कृतान्त भगिनि क्षमया तरङ्गै- रङ्गानि सिञ्च मम शाम्यतु देह दाहः॥ गीत गोविन्द सप्तम सर्ग अर्थात् “हे मल्यानिल ! तुम अपनी बाधाओं को अवश्य ही मेरे लिये उपस्थित करो ? और हे मदन ! तुम भी अपने पाँचों वाणों को एक साथ चलाकर मेरे प्राणों को खींच लो-हरण कर लो, ताकि ये फिर से अपने भवन (इस मेरे देह) का आश्रय न कर सकें। हे कृतान्त भगिनि ! यमुने !! तुम क्यों क्षमा कर रही हो ? तुम भी अपनी शीतल वीचियों का सिञ्चन करो, जिससे शीघ्र मेरा देह दाह हो-शरीर जल सके अस्तु; यह श्रीकृष्ण विरहिणी राधा की दशा है।
१४६ • • हित चौरासी
- ३८ - अवतरण-पुनः मानिनि राधा के प्रति श्रीहित सजनी का अनुरोध है। जिसमें ये श्रीलालजी की दशा का वर्णन करते हुए उनके (प्रियतम के) निकट चलने के लिये आग्रह कर रही हैं। श्रीप्रियाजी से श्रीहित सखी कहती हैं- सारङ्ग मूल-वेगि चलहि उठि गहरु करति कत, निकुंज बुलावत लाल। हा राधा राधिका पुकारत, निरखि मदन गज ढाल॥ करत सहाइ सरद ससि मारुत, फूटि मिली उर माल। दुर्गम तकत समर अति कातर, करहि न पिय प्रतिपाल॥ (जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर, श्रवन सुनत तेहि काल। लै राखे गिरि कुच बिच सुंदर, सुरत-सूर ब्रज बाल॥३८॥ भावार्थ-(हित सखी ने कहा-) "हे राधे ! अब शीघ्र उठ चलो, देर क्यों कर रही हो ? देखो, तुम्हें प्रियतम श्रीलालजी ने बुलाया है। वे काम रूप गजराज को अपनी ओर ढलता आता देखकर "हा राधा ! हा हा राधिके !! इस प्रकार पुकार रहे हैं। (और इस समय) शरत्कालीन चन्द्रमा शीतल पवन, तथा उनके हृदय की सदा सङ्गिनी माला भी आज विद्रोह पूर्वक (शत्रु रूप काम गज से) जा मिली है, अतएव (वे श्रीकृष्ण) युद्ध से अत्यन्त घबराकर अब किसी दुर्गम (कठिनाई से जहाँ कोई शत्रु प्रवेश पा सके) स्थल की ताक-खोज में हैं तब (हे प्यारी !) तुम चल कर अपने प्रियतम का प्रतिपाल-रंक्षण क्यों नहीं करतीं ?" श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (सखी के मुख से) उक्त समाचार अपने कानों में पड़ते ही अत्यन्त आतुर होकर वह सुरत शूर बाला-श्रीराधा उसी