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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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१३६ • • हित चौरासी प्रात काल रजनी सब जागे, सूचत सुख दृग लोलनि। आलसवंत अरुन अति व्याकुल, कछु उपजत गति गोलनि॥ नर्त्तनि भृकुटि वदन अंबुज मृदु, सरस हास मधु बोलनि। अति आसक्त लाल अलि लंपट, बस कीने बिनु मोलनि॥ विलुलित सिथिल स्याम छूटी लट, राजत रुचिर कपोलनि। रति विपरित चुंबन आलिंगन, चिबुक चारु टक टोलनि॥ कबहुँ श्रमित किसलय सिज्या पर, मुख अंचल झकझोलनि। दिन हरिवंश दासि हिय सींचत, वारिधि केलि कलोलनि॥३४॥ भावार्थ – अहह ! कितना विलक्षण है युगल किशोर का वन की कुओं कुओं का विहरण ? यद्यपि अत्यन्त सङ्कीर्ण (लता सघन) गलियों से होकर निकलते हैं फिर दोनों के निचोल वस्त्रों का लताओं से स्पर्श तक नहीं हो पाता (ऐसे एकमेक हो जाते हैं परस्पर में सँट कर चलते हुए !) आज दोनों सारी रात जागते ही रहे हैं जिसकी सूचना अब प्रातः काल इनके लोल लोल लोचनों से प्राप्त हो रही है जो दृग आलस्य मय, अरुण और अति व्याकुल हैं और नेत्र गोलक भी किञ्चित किञ्चत् गति उत्पन्न करते हैं, नेत्रों की पलकें शिथिल हैं- भार से झँपी हुई हैं। भृकुटियों में नर्त्तन है और वदन कमल में सरस हास के साथ हैं मधुर मधुर वचन। अतः सिद्ध है कि अत्यन्त आसक्त एवं लम्पट भ्रमर श्रीलालजी को श्रीप्रियाजी ने विना मोल के ही वश में कर रखा है- अपना वशवर्त्ती कर रखा है। रुचिर कपोलों पर बिखरी हुई काली शिथिल केश माला शोभा पा रही है।