हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १३७ कभी विपरीत रति का विलास है, तो कभी चुम्बन, तो कभी आलिङ्गन ही और कभी चारु चिबुक का प्रेम पूर्ण उचकाव ही कभी कभी युगल किशोर रति विहार से श्रमित होकर किशलय शय्या पर पौढ़ ही जाते हैं और परस्पर में एक दूसरे के वदन पर अपने अपने वसनाञ्चलों से झकझोलन करने लगते वयार डुलाने लगते हैं। इस प्रकार दिन प्रति-निरन्तर 'हरिवंश दासी' के हृदय को अपने केलि वारिधि की लहरियों से सींचते ही रहते हैं। – ३५ – अवतरण – नव नव प्रभा मण्डित श्रीवृन्दावन धाम है। प्रातः काल का पुनीत समय है। साँवन की सुहावनी ऋतु है। सर्वत्र श्रीवन में हिण्डोल पड़े हैं। रस सने युगल किशोर मन चाहे हिण्डोलों में चढ़कर झूलते हैं। कभी वन हिण्डोल से झूलते हैं, तो कभी रति हिण्डोल रंग। श्रम से जनित चिह्न श्रीमुख पर प्रकट हो आते हैं जो रात्रि के विहार हिण्डोल की मानो सूचना सी देते हैं। अस्तु; श्रीहित सखीजी अपनी अन्तरङ्ग सखियाँ ललिता विशाखा आदि के साथ इस हिण्डोल विहार का सुख दर्शन करतीं और आनन्द में भर कर रस विहार की प्रशंसा करती हुई कहती हैं– देव गंधार मूल–झूलत दोऊ नवल किसोर। रजनी जनित रंग सुख सुचत अंग अंग उठि भोर।। अति अनुराग भरे मिलि गावत सुर मंदर कल घोर। बीच बीच प्रीतम चित चोरति प्रिया नैन की कोर।। अबला अति सुकुमारि डरत मन वर हिंडोर झँकोर। पुलकि पुलकि प्रीतम उर लागति दै नव उरज अँकोर।। अरुझी विमल माल कंकन सौं कुंडल सौं कच डोर। वेपथ जुत क्यों बनै विवेचत आनँद बढ्यौ न थोर।। निरखि निरखि फूलतिं ललितादिक विवि मुख चंद चकोर। दै असीस हरिवंश प्रसंसत करि अंचल की छोर।।३५।।