हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ • • हित चौरासी भावार्थ—(आज) दोनों नवल किशोर (हिण्डोल) झूल रहे हैं। उठने पर प्रातः काल अङ्ग-अङ्ग से रात्रि जनित आनन्द सुख की व्यञ्जना-सूचना सी हो रही है। दोनों अत्यन्त अनुराग से भरे हुए कभी मंद मधुर तो कभी तार(उच्च) मधुर स्वर में गान करते हैं। बीच बीच में श्रीप्रियाजी अपने नयन कोरों से प्रियतम के चित्त की चोरी भी करती जाती हैं। श्रेष्ठ हिण्डोल की लम्बी झंकोरों (झूलों) से अत्यन्त सुकुमारी अबला श्रीराधा का मन डर जाता है तब वे बार-बार रोमाञ्चित हो होकर और मानो अपने नव उरोजों की भेंट (अँकोर) सी देकर प्रियतम के हृदय से डर के मारे चिपट-लिपट जाती हैं। तरल हिण्डोल की झूलों में प्रियतम के उर की विमल माल प्रिया के कङ्कण से और प्रिया की कच डोर प्रियतम के कुण्डलों से उलझ गये। उलझ तो गये पर अब तरल हिण्डोल में यह उलझन सुलझायी कैसे जा सकती है ? इस उलझन में थोड़ा नहीं अपितु अत्यधिक आनन्द बढ़ा। हिण्डोल पर शोभित नवल युगल किशोर के पारस्परिक युगल चन्द्रमुख और युगल क्यों चतुः चारु चकोरों को देख-देखकर ललिता आदि सखियाँ प्रसन्न हो रही हैं और 'हरिवंश' भी (वलिहार भाव से) सम्मुख अञ्चल तटी करके युगल को आशीष देते और प्रशंसा कर रहे हैं। – ३६ – अवतरण – यमुना के परम पावन पुलिन पर आज रसिक शेखर श्रीलालजी ने रास रस की सरस आयोजना की है। उस रास में किशोरी श्रीराधा के सहित समस्त सहचरियाँ नृत्य गान एवं वाद्य में समान रूप से भाग ले रही हैं। यदि नृत्य परायण हैं, तो कोई उच्च स्वर से गान होकर रही हैं और कोई वाद्य वादन प्रवीण सखियाँ बाजे ही बजा रही हैं। समस्त युवति मण्डल के बीच विराजमान (मध्यवर्ती) श्रीलालजी अपने सुललित कण्ठ से सारङ्ग राग आलाप रहे हैं और श्रीवृषभानु किशोरी उसी राग के अनुसार सुधङ्ग नामक नृत्य गति का प्रदर्शन कर रही हैं। इस अलौकिक आनन्द को देख कर सुर नायक-इन्द्रराज फूल उठते हैं और पुष्प वृष्टि करने लगते है।