हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
DevanagariHindipublished275 पृष्ठ
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हित चौरासी • • १३५ छोरों का अपने अपने नख चन्द्र से स्पर्श करते (-एवं आकर्षण करते हैं।) अधर क्षत विक्षत हैं, गण्ड मण्डल कज्जल से मण्डित है। ललाट पटल पर तिलक कुछ थोड़ा सा ही अवशेष रह गया है। अरुण नयन, जो चोर अलि-भ्रमर ही हैं केश राशि एवं उँगलियों के द्वारा छिपाये जाने पर भी नहीं छिपते -गोप्य रस पूर्ण रति विहार का प्रकाश किये ही दे रहे हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि सुरत समुद्र की झकझोर के कारण (आज दोनों को अपने अपने) तन एवं मन की भी सँभाल नहीं रह गयी है, (ऐसे रस मग्न हो रहे हैं!)
- ३४ - अवतरण - श्रीवृन्दावन में विचरण करते हुए युगल किशोर कभी एक कुञ्ज से निकल कर दूसरी में प्रवेश करते हैं कभी एक गली से होकर दूसरी में जाते हैं। कभी-कभी अत्यन्त सङ्कीर्ण लता विटपाच्छादित कुञ्जों से होकर निकलते समय पट वस्त्रों के उलझने की पूर्ण आशङ्का होने पर भी वे नहीं उलझ पाते कुछ कुशल कला से निष्क्रमण कर जाते हैं। गलवहिया देकर चलते हैं तो सही पर दो हैं ऐसा भी प्रतीत नहीं हो पाता। वन विहार के उपरान्त रात्रि को सुख मय सुरत विहार की क्रीड़ा का आनन्द वितरण करते हैं और इससे समस्त सहचरि समाज को किसी अनिर्वचनीय सुख में मानो डुबा देते हैं किंवा केलि वारिधि की अमृत लहरियों से भिंगा देते हैं। इसी वन विहार एवं रसमय सुरत विहार सुख का साङ्केतिक वर्णन श्रीहिताचार्य चरण अपने स्वस्वरूप (सखी भाव) के अनुसन्धान पूर्वक इस प्रकार करते हैं- देव गंधार मूल- वन की कुंजनि कुंजनि डोलनि। निकसत निपट साँकरी बीथिनु, परसत नाँहि निचोलनि।।