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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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१३४ • • हित चौरासी टिप्पणी-इस पद की वर्णना अन्य पदों से कुछ विलक्षण है। इस वर्णन में आदि से अन्त तक नायक एवं नायिका सर्वथा अनुकूल हैं और उस अनुकूलता में भी विलास की रमणीयता, सरसता एवं प्रियता की पराकाष्ठा हैं। जो लोग "नेति नेति वचनामृत" और "गौर श्याम भुज कलह मनोहर" में ही रस विशेष की सिद्धि मानते हैं वे- वे भुज पीन पयोधर परसत वाम दृशा पिय हार।' की झाँकी का अनुभव करें अपने भाव पूर्ण हृदय में। कितनी रस मयी है इसकी कल्पना ?

  • ३३ - अवतरण- आज प्रातः काल श्रीनन्द नन्दन एवं वृषभानु नन्दिनी उनींदे ही उठ पड़े हैं और निकुञ्ज के अन्तर्भाग में डगमगाते चरणों से प्रेम विक्षिप्त की सी दशा में किंवा सुरतालस पूर्ण खुमारी में डूबे वहीं भ्रमण कर रहे हैं। युगल की इस दशा का दर्शन-अवलोकन करके श्रीहित सजनी अपनी सखियों से उसका वर्णन कर रही हैं- देव गंधार मूल- आजु बन राजत जुगल किसोर। नंद नँदन वृषभानु नंदिनी उठे उनींदे भोर॥ डगमगात पग परत सिथिल गति परसत नख ससि छोर। दसन बसन खंडित मषि मंडित गंड तिलक कछु थोर॥ दुरत न कच करजनि के रोकें अरुन नैन अलि चोर। (जै श्री) हित हरिवंश सँभार न तन मन सुरत समुद्र झकोर॥३३॥ भावार्थ- आज श्रीवृन्दावन में युगल किशोर यों शोभा पा रहे हैं कि नन्द नन्दन एवं श्रीवृषभानु नन्दिनी प्रातः काल ही उनींदे उठ पड़े हैं-रात्रि में पूरी तरह सो भी नहीं पाये (क्योंकि रति विहार के आनन्द ने मानों उन्हें सोने को कोई समय ही न दिया !) अतः चलते समय उनके चरण डगमगाते हैं और (गमन) गति भी शिथिल है। चलते हुए दोनों एक दूसरे को वसनाञ्चलों का-पट
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